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सुदूर ब्रह्मांड में एलियंस को पुकारता ये अंतरिक्ष यान Voyager Mission Hindi

मानवों की एक फितरत होती है खोज करने की उसकी इसी फितरत ने आज विज्ञान को इतना आगे वा खड़ा किया है कि अब हम हर काम को घर बैठे कर पाते हैं, जो पहले मुमकिन नहीं था। जब बात ब्रह्मांड की हो तो फिर उसके रहस्य जानने की दिलचस्पी भला किसी को क्यों नहीं होगी। इन्हीं रहस्यों को जानने के लिए नासा ने वायेजर (Voyager Mission Hindi) मिशन की नींव रखी थी, जिसने दुनिया को ही बदल दिया।

1972 में नासा ने रखी नींव

साल 1972 में नासा ने वायेजर मिशन की नींव रखी थी, नासा सौर-मंडल में कुछ ग्रहों को करीब से देखना चाहता था, इन ग्रहों को पहले सिर्फ Telescope से ही देखा गया था तो हमारी जानकारी इनके प्रति काफी कम थी। नासा ने सौर-मंडल के ग्रहों Jupiter, Saturn (शनि ) , Uranus और Neptune और उनके चंद्रमाओं के अध्ययन के लिए ये मिशन तैयार किये थे।

दो अंतरिक्ष यान धरती से रवाना

40 साल पहले 1977 में अगस्त और सितंबर महीने में अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने दो अंतरिक्ष यान धरती से रवाना किए थे। इन्हीं का नाम था वायेजर एक और दो। वायेजर 2 को 20 अगस्त को अमरीकी अंतरिक्ष सेंटर केप कनावरल से छोड़ा गया था। वहीं वायेजर एक को पांच सितंबर को रवाना किया गया।

अरबों किलोमीटर हैं दूर

आज 40 साल बाद ये दोनो अंतरिक्ष यान धरती से अरबों किलोमीटर दूर हैं। वायेजर 1 तो धरती से 20 अरब किलोमीटर दूर जा चुका है तो वहीं वायेजर 2 धरती से दूसरा रास्ता लेकर 17 अरब किलोमीटर दूर निकल गया है। वायेजर 1 ने आज से 4 साल पहले ही हमारे सौर-मंडल को अलबिदा कह दिया था। अब यह यान Interstellar Journey पर निकल चुका है, यानि अब यह हमारे सुर्य के प्रभाव से बाहर आकर तारों की अनंत दुनिया की यात्रा कर रहा है।

एक दिन में ज्यादा लगता है संदेश भेजन में

वायेजर (Voyager Mission Hindi) एक से धरती पर संदेश आने जाने में क़रीब 38 घंटे लगते हैं। वो भी तब जब ये रेडियो संकेत, 1 सेकेंड में तीन लाख किलोमीटर की दूरी तय करते हैं, यानी प्रकाश की गति से चलते हैं। वहीं वायेजर 2 से धरती तक संदेश आने में 30 घंटे लगते हैं। सबसे दिलचस्प बात ये है कि आज 40 साल बाद भी दोनों यान काम कर रहे हैं और मानवियत तक ब्रह्मांड के तमाम राज़ पहुंचा रहे हैं।

Carl Segan

Carl Segan – कार्ल सगन

वायेजर अभियान से जुड़े एक और व्यक्ति थे वैज्ञानिक कार्ल सगन। सगन ने वायेजर यानों से ग्रामोफ़ोन जोड़ने के प्रोजेक्ट पर काम किया था। वो पहले अमरीका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोफिजिक्स पढ़ाया करते थे। बाद में सगन नासा के लिए काम करने लगे। वो मंगल ग्रह पर जाने वाले पहले अभियान वाइकिंग का भी हिस्सा थे। उन्होंने बच्चों के लिए विज्ञान की कई दिलचस्प क़िताबें लिखीं। कई रेडियो और टीवी कार्यक्रमों में भी भागीदारी की।

वायेजर में ग्रामोफ़ोन

इन यानों में ग्रामोफ़ोन लगाने का उद्देश्य एक आशा थी। आशा ये कि धरती के अलावा भी ब्रह्मांड में कहीं जीवन अवश्य है। यात्रा करते-करते जब किसी और सभ्यता को हमारा वायेजर (Voyager Mission Hindi) मिले, तो उसे मानवी सभ्यता की एक झलक इन ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड के ज़रिए मिले। यानी वायेजर सिर्फ़ एक अंतरिक्ष अभियान नहीं, बल्कि सुदूर ब्रह्मांड को भेजा गया मानवता का संदेश भी हैं।

ये ग्रामोफ़ोन तांबे के डिस्क से बने हैं, जो क़रीब एक अरब साल तक सही सलामत रहेंगे। इस दौरान जो अगर वायेजर किसी ऐसी सभ्यता के हाथ लग गया जो ब्रह्मांड में कहीं बसती है, तो, इन ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड के ज़रिए उन्हें मानवता के होने का, उसकी प्रगति का संदेश मिलेगा।

उर्जा हो रही है खत्म

अब वायजेर एक (Voyager 1) और दो (Voyager 2) यान अब बहुत बुढ़े हो चुके हैं, इनकी उर्जा खत्म होती जा रही है। इनमें बचा इंधन बस कुछ वर्षों तक ही हमारा साथ देगा, उसके बाद ये यान हमसे संपर्क तोड़कर ब्रह्मांड की अनंत यात्रा की और निकल जायेंगे। इन दोनों यान की खास बात ये है कि ये यान इंधन संपर्क टूट जाने और इंधन के ना रहने पर भी कई हजारों साल तक ऐसे ही विचरते रहेंगे जबतक कोई चीज इनसे टकराकर इन्हें नष्ट ना करदे।.

वायेजर यानों के वीडियो देखें 

वायेजर (Voyager Mission Hindi) अंतरिक्ष यानों के बारे में और विस्तार से जानने के लिए यह वीडियो जरुर देखें, इसमें इन मिशन की विस्तृत जानकारी दी गई है। एक बार वीडियो जरुर देखें और शेयर करें…..

Image Source – NASA || Featured Image Source 

Shivam Sharma

शिवम शर्मा विज्ञानम् के मुख्य लेखक हैं, इन्हें विज्ञान और शास्त्रो में बहुत रुचि है। इनका मुख्य योगदान अंतरिक्ष विज्ञान और भौतिक विज्ञान में है। साथ में यह तकनीक और गैजेट्स पर भी काम करते हैं।

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