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अरबों सालों से भटक रहे हैं ये ग्रह, क्या इन पर जीवन पनप सकता है? Rogue Planets In Hindi

100 अरब से ज्यादा ग्रह हमारी आकाशगंगा में ही 1200 करोड़ सालों से भटक रहे हैं!

ब्रह्मांड जो चार तरह के फोर्स से बना हुआ है, हर चीज़ को एकदम व्यवस्थित रखता है, अरबों तारे विशालकाय आकाशगंगा के केंद्र के चक्कर लगाते हैं तो वहीं हजारों आकाशगंगाए एक साथ मिलकर विशाल गैलेक्सी समुह को जन्म देती हैं, जो आकार में इतने विशाल होते हैं कि आपकी कल्पना में भी नहीं समा सकते हैं। यहां ग्रेविटेशनल फोर्स का बोलबाला है जो हर चीज़ को बांधे रखता है, पर दो औबजेक्ट को एक दूसरे से अट्रैक्ट और समाने वाली फोर्स ग्रेविटी कई बार किसी ग्रह या तारे और तो और किसी विशालकाय आकाशगंगा यानि गैलेक्सी के लिए आफ़त भी बन जाती है और उसे उसके सिस्टम से उखाड़कर बाहर फेंक देती है।

ग्रेविटी ये काम इतनी ताकत से करती है कि उस औबजेक्ट को फिर अरबों सालों तक अकेले ही ब्रह्मांड में भटकना पड़ता है। ऐसे भटकते हुए पिंडों को रोग औबजेक्ट (Rogue Objects) कहा जाता है और ग्रहों को रोग प्लैनेट (Rogue Planets In Hindi) कहा जाता है ये किसी भी आकाशगंगा, तारे या ग्रह की परिक्रमा नहीं करते हैं।

1200 करोड़ सालों से भटक रहे अंतरिक्ष में

ब्रह्मांड में ऐसे कई औबजेक्ट हैं जो 1200 करोड़ साल से भी ज्यादा समय तक भटक ही रहे हैं, ये औबजेक्स ज्यादातर ग्रह और तारे होते हैं जो अरबों सालों से अकेले ही ब्रह्मांड में भटक रहे हैं। तो आखिर ये रोग औबजेक्ट जिन्हें हम ज्यादातर रोग प्लैनेट्स और रोग स्टार कहते हैं इस ब्रह्मांड में क्यों भटकते हैं क्या ये कभी दूसरे सौर-मंडल का हिस्सा बन पाते हैं? क्या हम इन भटकते हुए ग्रहों को पकड़कर उनपर इंसानों को बसा सकते हैं, ये ग्रह किस हद तक ठंडे होते हैं और क्यों ये हमें दिखाई नहीं देते हैं इन सब बातों को जानने के लिए ये लेख पूरा जरुर पढ़िए। 

एक भटकता हुआ ग्रह (Rogue Planet)

ब्रह्मांड में कोई भी पिंड जो अपने तारे या ग्रह की ग्रेविटेशनल फोर्स से फ्री हो गया हो और उसकी परिक्रमा ना करता हो ऐसे औबजेक्ट या पिंड को रोग औबजेक्ट कहा जाता है। ये कोई छोटा सा कामेट, विशाल ग्रह, या कोई तारा और खुद पूरी आकाशगंगा भी हो सकती है। जिन ग्रहों का कोई तारा नहीं होता है और वो अकेले ही ब्रह्मांड में भटकते रहते हैं तो ऐसे ग्रहों को ही रोग प्लैनेट्स (Rogue Planets In Hindi) कहा जाता है। आइये अब विस्तार से इनके बारे में जानेंगे और देखेंगे कि क्या ये ग्रह कैसे भटक जाते हैं और किस प्रकार के जीवन को पनपने का मौका दे सकते हैं,क्या भविष्य में यहां मानव बस सकता है? आइये विस्तार से जानते हैं। 

भटकता हुआ ग्रह (rogue planets in hindi) किसे कहा जाता है?

Rogue Planets ज्यादातर फ़ेल्ड स्टार्स (Failed Stars) माने जाते हैं जिन्हें ब्राउन ड्वार्फ़ (Brown Dwarf) कहा जाता है, पर कुछ ऐसे भी ग्रह होते हैं जो इन ब्राउन ड्वार्फ़ से आकार में छोटे और गैस से बने हुए होते हैं ऐसे ग्रहों को सब ब्राउन ड्वार्फ़ (Sub-Brown Dwarf) ग्रह कहा जाता है। 

इसके अलावा भी ऐसे रोग प्लैनेट्स की संभावना वैज्ञानिकों ने जताई है जो पृथ्वी की तरह ही चट्टानी ग्रह हो और आकार में इसके बराबर हों।  खैर ये तो इनकी शुरूआती जानकारी थी, अब मैं आपको आगे बताऊँगा कि कैसे ये अपने सिस्टम से भटक जाते हैं और क्यों वैज्ञानिक मानते हैं कि ये अरबों सालों तक कई तरह के विचित्र जीवों के घर भी हो सकते हैं। 

सौर-मंडल के बनते समय कई ग्रह भटक जाते हैं-

जब नये सोलर सिस्टम का जन्म होता है तो उस समय कई प्रोटोप्लैनेट्स (Protoplanets) यानि नये बनने वाले ग्रह आस-पास के औबजेक्ट को खाकर बड़े होते रहते हैं, उस समय सौर मंडल पूरा अस्त-व्यस्त होता है और कई औबजेक्ट एक दूसरे से टकराते रहते हैं।

ऐसे में कोई बड़ा पिंड और ग्रह जब हमारे प्रोटोप्लैनेट के पास आता है या उससे टकराता है तो उसके परिक्रमा पथ (Orbit) को बदल देता है, Orbit से भटकने के कारण प्रोटोप्लैनेट अपने प्लैनेट सिस्टम से बाहर हो जाता है, उसके मुख्य तारे की ग्रेविटी भी उसे वापिस नहीं ला पाती है और वो (Rogue Planets In Hindi) फिर हमेशा के लिए अनंत ब्रह्मांड में भटकता रहता है।

हालांकि ये सौर-मंडल के बनने के दौरान होता है, पर कई बार अरबों साल पुराने सोलर सिस्टम से भी ग्रह औरबिट से भटक जाते हैं, जब कोई Rogue Star और भटकता हुआ तारा या कोई ब्लैक होल किसी सौर-मंडल में गलती से आ जाता है, तो उसकी जबरदस्त ग्रेविटी से सौर-मंडल में कई ग्रह अपने कक्षा से भटक जाते हैं। ॉ

जितनी ज्यादा किसी रोग प्लैनेट और ब्लैक होल की ग्रेविटी होती है उतने ही ग्रहों को वो सौर-मंडल से दूर फेंक देता है, एकबार ये ग्रह अपने तारे की औरबिट से दूर हो जाते हैं तो फिर हमेशा के लिए अकेले ही भटकते रहते हैं। कई बार देखा गया है कि जब किसी ग्रह का तारा सूपरनोवा धमाका करके खत्म हो जाता है तो जो ग्रह उस धमाके से बच जाते हैं वो अपनी ओरबिट भटक कर रोग प्लैनेट्स बन जाते हैं। 

आकाशगंगा में है 100 अरब से ज्यादा भटकते ग्रह

हाल में हुई एक खोज के आधार पर वैज्ञानिक मानते हैं कि अकेले ही हमारी मिल्की वे गैलेक्सी में 100 अरब से ज्यादा रोग प्लैनेट्स मौजूद हो सकते हैं , जो अगर सही है तो ये गैलेक्सी में मौजूद तारों की संख्या के बराबर हैं। ब्रह्मांड में अकेले भटकने के कारण और बिना अपने होस्ट स्टार के इन ग्रहों पर किसी भी तरह का कोई प्रकाश नहीं पड़ता है, ऐसे में ये भयानक अंधेरे और ठंड से घिरे रहते हैं, यहां तापमान -270 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। ये इतना ज्यादा तापमान है कि यहां पर ऑक्सीजन गैस तक जम जाती है।

आकाशगंगा में ऐसे 100 अरब ग्रह हैं जो किसी भी तारे की ओरबिट नहीं करते हैं और अरबों सालों तक भटकते हैं। (NASA/JPL-CALTECH/R. HURT (CALTECH-IPAC)

बिना हीट और लाइट के के कारण यहां ना तो कभी किसी तरह का मौसम होता है और ना ही दिन और रात होती है, घनघोर अंधेरे में घिरे हुए इन ग्रहों (Rogue Planets In Hindi) पर आपको समय के गुजरने का एहसास भी नहीं होगा। पर इतना खतरनाक और ठंडा होने के बावजूद भी इन ग्रहों की गहराईयों में जीवन के पनपने की संभावना होती है। पर जब ये ग्रह इतने ज्यादा ठंडे हैं और बिना किसी तारे के ब्रह्मांड में अनाथ घूम रहे हैं तो ये भला इनमें जीवन कैसे पनप सकता है आइये एक जल्दी से इसे समझते हैं। 

क्या इन ग्रहों पर जीवन पनप सकता है?

कल्पना कीजिए एक पृथ्वी जैसे ग्रह की जो अपने तारे की कक्षा (Orbit) से भटक कर सुदूर अंतरिक्ष (Deep Space) में चला गया हो जंहा ना तो किसी तरह का कोई उर्जा का स्रोत है और ना ही कोई लाइट है।

ऐसे में अगर हम इसमें जीवन को तलाशने की कोशिश करें तो वो केवल हमें इसकी सतह के नीचे ही देखने को मिल सकता है। ज्यादातर ग्रह अपने सूर्य से उर्जा लेते हैं, पर ग्रहों के अंदर मौजूद Core भी उसे गर्म करने में मदद करती है, तो ऐसे में बची हुई 0.03 परसेंट उर्जा उसे उसकी Core से ही प्राप्त होती है।

पृथ्वी की कोर

इस ऐनेर्जी को आप जियोथर्मल ऐनेर्जी (Geothermal Energy) ने नाम से जानते हैं। पृथ्वी जैसे ग्रह की Core बहुत ज्यादा गर्म होती है। इसका तापमान सूर्य की सतह जितना होता है, Inner Core के घेरने वाली आउटर कोर जिसमें बहुत पिघलते हुए धातू होते हैं बहुत धीरे धीरे ठोस में बदलते है, जबतक ये लीक्विड से सोलिड में नहीं बदल जाते है हमारा ग्रह तबतक जीवन को सपोर्ट करने के लाइक बना रहता है। 

ग्रह की Inner Core की हीट से जीवन की संभावना

रोग प्लैनेट्स में Core की यही ऊष्मा (Heat) उसकी ज़मी हुई भारी बर्फ की सतह के नीचे बर्फ को तरल जल (liquid water) में बदल देती है, जो जीवन के पनपने के लिए सबसे जरूरी तत्व माना जाता है। जबतक ग्रह की उसकी Core से ऊष्मा (Heat) मिलती रहती है तबतक वहां पर जीवन पनप सकता है जो समय के साथ-साथ विकसित होता है।

इसके अलावा पृथ्वी के आकार के रोग प्लैनेट्स जिनका वातावरण बहुत घना हो और हाई प्रेशर हाइड्रोजन से बना हो तो -270 डिग्री में भी ये गैस नहीं जमेगी जिससे हीट वातावरण में ही घिरी रहेगी और रोग पलैनेट्स (Rogue Planets In Hindi) पर पानी नहीं जमेगा जिससे जीवन और अच्छे से पनप सकता है।

वहीं अगर किसी रोग प्लैनेट का चंद्रमा हो तो भी उस चंद्रमा के जरिए वो भटकता हुआ ग्रह कुछ गर्मी को पैदा कर सकता है, चांद के टाइडल फोर्स (Tidal Force) के कारण ग्रह अपने आकार को कम ज्यादा करता है और इससे उसमें हीट पैदा होती है।

बर्फ की बेहद मोटी चादर के नीचे जीवन की संभावना

स तरह से वहां पर जीवन के पनपने की संभावना बढ़ सकती है, हालांकि इतना कुछ होने पर भी रोग प्लैनेट (Rogue Planets In Hindi) पर जीवन केवल बर्फ की कई किलोमीटर की मोटी चादर के नीचे ही पनप सकता है।

पृथ्वी पर हम डीप औसियन में कई ऐसे विचित्र जीवों को देखते हैं जो कई किलोमीटर की गहराई में रहते हैं, ऐसे में हम मान सकते हैं कि रोग प्लैनेटस पर भी हमें ऐसे ही जीव या इनसे भी खतरनाक जीव देखने को मिल सकते हैं, जो वहां करोड़ों सालों से पनप रहें होंगे।

पर गहराई से देखा जाये तो ये प्लैनेट्स फिलहाल इंसानों की पहुँच से बहुत दूर हैं, लागातर ब्रह्मांड अरबों सालों तक भटकने के कारण इन्हें खोजना बहुत मुश्किल है और केवल माइक्रो लेंसिग से ही इनका पता लगाया जा सकता है। ये तकनीक ग्रेविटेशनल लेंसिग की तरह ही बस यहां पर एक रोग प्लैनेट दूर स्थित तारे से आ रही लाइट को अपनी ग्रेविटी से बेंड कर देता है और जब लाइट को हमारा टेलीस्कोप रिसीब करता है तो हम फिर एक रोग प्लैनेट को खोज पाते हैं। 

पृथ्वी के सबसे पास WISE 0855−0714 नाम का एक sub-brown dwarf है जो हमसे 7.27 लाइट ईयर दूर है, ये एक ग्रह भी हो सकता है, जो ब्रह्मांड में भटक रहा हो, आकार में जूपिटर से बड़ा और उससे 5 गुना भारी होने के कारण ये हमारे लिए किसी खास काम तो नहीं है पर फिर भी हम इसके मोशन से और बनावट से ब्राउन ड्वार्फ़ के बारे में अच्छे से जान सकते हैँ।

WISE J085510.83-071442.5 एक ग्रह जो भटक रहा है, नासा ने इसे अपने Wide-field Infrared Survey Explorer की मदद से 2010 में देखा था।
NASA/JPL-Caltech/Penn State University

क्या होगा अगर हमारा सूर्य भटक जाये?

आपने ग्रहों (Rogue Planets In Hindi) के भटकने का कारण जान लिया हैै, पर क्या आपको पता है कि ग्रह की तरह एक तारा भी आकाशगंगा से भटक सकता है, हालांकि ये बेहद दूर्लभ है, पर ब्रह्मांड में वैज्ञानिकों ने भटकते हुए तारे भी खोजे हैं। इन भटकते हुए तारों को रोग स्टार्स कहा जाता है, ये ज्यादातर दो आकाशगंगा के टकराते समय भटक जाते हैं, आकाशगंगा के जबरदस्त गुरूत्वाकर्षण बल के कारण ये अपनी ओरबिट से भटककर अनंत ब्रह्मांड में आवारा हो जाते हैं।

रोग स्टार्स भले ही भटकते हों पर अगर उसके पास अपने ग्रह हैं तो उस स्थिति में फिर हम वहां जीवन को खोज सकते हैं, क्योंकि ग्रहों को ऐनेर्जी देने के लिए अपना तारा (Host Star)  होना सबसे जरूरी है, अगर किसी कारण हमारा सूर्य अपनी ओरबिट से भटक भी जाता है और रोग स्टार बन जाता है तो तो भी हम 5 अरब सालों तक जीवित रह सकते हैं जबतक सूर्य अपना सारा फ़्यूल खत्म नहीं कर देता। पर वहीं सोलर सिस्टम से हमारी पृथ्वी अपनी ओरबिट को छोड़कर कहीं और भटक जाती है तो फिर आप समझ ही सकते हैं कि ये कितना खतरनाक हो सकता है। 

नासा की इन्हें खोजने की होड़

हाल में ही नासा ने इन भटकते हुए ग्रहों (Rogue Planets In Hindi) और तारों को खोजने के लिए एक खास इंफ्रारेड टेलीस्कोप तैयार किया है जिसका नाम रोमन स्पेस टेलीस्कोप है, ये अभी कंस्ट्रकशन फेज में है पर 2025 तक ये स्पेस में जा करके वहां से हमें कई ऐक्सोप्लैनेट की इमेज के साथ, साथ ग्रेविटेशनल माइक्रोलेंसिग के जरिए रोग प्लैनेट्स खोजने में मदद करेगा।

इसके अलावा ये टेलीस्कोप ब्रह्मांड में डार्क मैटर और डार्क ऐनेर्जी  के इफैक्ट को भी नापेगा, 2.4 मीटर के प्राइमरी मिरर से लैस ये टेलीस्कोप अपने  Wide-Field Instrument की 288 मेगापिक्सल की पावर से हबल टेलीस्कोप से भी 100 गुना ज्यादा बेहतर इमेज ले सकता है। फिलहाल नासा की प्राइरोरिटी जेम्स वेब टेलीस्कोप को लाँच करने की है जो अगर पूरा हो जाता है तो स्पेस साइंस को बदल कर रख सकता है, उसके बाद रोमन टेलीस्कोप लाँच होगा और फिर मैं और आप इन रोग प्लैनेट्स को और करीब से समझ पायेंगे।

Shivam Sharma

शिवम शर्मा विज्ञानम् के मुख्य लेखक हैं, इन्हें विज्ञान और शास्त्रो में बहुत रुचि है। इनका मुख्य योगदान अंतरिक्ष विज्ञान और भौतिक विज्ञान में है। साथ में यह तकनीक और गैजेट्स पर भी काम करते हैं।

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