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सेटलाइट भविष्य में खत्म कर सकते हैं हर मानव मिशन – The Future Of Satellites In Hindi

साल 2040 तक 1 लाख सैटलाइट पृथ्वी पर कचरे का विशाल ढ़ेर बना सकते हैं!

दोस्तों क्या आपने कभी सोचा है कि मानव द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए सैटेलाइट जब खराब हो जाते हैं या आपने काम पूरा करने के बाद उनका क्या होता होगा। आइए जानते हैं। जब इन सेटेलाइट (Future Of Satellites In Hindi) का काम पूरा हो जाता है या फिर खराब हो जाते हैं तब यह अंतरिक्ष के कचरे में शामिल हो जाते हैं। अंतरिक्ष कचरे में खराब अंतरिक्षयान, रॉकेट, सैटेलाइट प्रक्षेपण यानों के अवशेष, अंतरिक्ष यात्रियों के दस्ताने, नटबोल्ट, उन्हें कसने वाले उपकरण और सैटेलाइट से अलग हुईं शीट शामिल होते हैं।

ये मिशन से जुड़ा वो कचरा है, जो मूल काम के बाद पीछे छूट जाता है। नासा का अनुमान है कि रोजाना करीब एक मलबा या तो पृथ्वी पर गिरता है या फिर पृथ्वी के वातावरण में आते ही जल कर नष्ट हो जाते है। चूंकी धरती का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा पानी का है, इसलिए ज्यादातर कचरा भी इन्हीं क्षेत्रों में आकर गिरता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी तक कचरा गिरने से किसी तरह के नुकसान की बात सामने नहीं आई है। क्योंकि ये कचरा पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते ही जलकर नष्ट हो जाता है। लेकिन अगर कोई बड़ा टुकड़ा पूरी तरह नष्ट ना हो और हमारे वायुमंडल में प्रवेश कर ले, तो उससे विनाशक प्रभाव पैदा हो सकते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये satellite अंतरिक्ष में ही कचरे के रूप में घूमते रहते हैं। कई बार तो यह आपस में ही टकरा जाते हैं और इसमें विस्फोट हो जाता है, जिससे यह छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट कर बिखर जाते हैं। अंतरिक्ष में घूमते हुए ये छोटे-छोटे satellite के टुकड़े हमारे अंतरिक्ष यान और संचार उपग्रहों को खराब या उन्हें तबाह करने की ताकत रखते हैं।

1957 से शुरू हुआ सैटेलाइट का अंतरिक्ष में जाना

1957 में जब दुनिया के पहले कृत्रिम उपग्रह Sputnik-1 को रूस ने अंतरिक्ष में भेजा, तब से आज तक हजारों उपग्रह, अंतरिक्ष यान, अंतरिक्ष shuttle, space station विभिन्न देशों द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित किए जा चुके हैं।

Sputnik Satellite (1957)
Sputnik Satellite (1957) Future Of Satellites In Hindi

एक अनुमान के अनुसार, अभी तक विभिन्न देशो द्वारा 23,000 से अधिक उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाया जा चुके हैं। और आपको  जानकर हैरानी होगी कि इसमें से लगभग 1200 सैटेलाइट ही सक्रिय हैं यानी कुल भेजे गए उपग्रहों में से मात्र 5 प्रतिशत ही वर्तमान में चालू अवस्था में हैं, जबकि बाकी 95 प्रतिशत उपग्रह खराब हो चुका है और कचरे का रूप ले चुके हैं। बेकार हो चुके ये 95 प्रतिशत कृत्रिम उपग्रह अभी भी अपनी कक्षाओं में निरंतर चक्कर लगा रहे हैं और अंतरिक्ष के कचरा को बढ़ा रहे हैं।

अंतरिक्ष में बढ़ रहा है कचरा – (Future Of Satellites In Hindi)

अंतरिक्ष में यह कचरा सेटेलाइट आपस में टकराते हैं और इस टकराव के कारण सेटेलाइट के छोटे-छोटे टुकड़े अंतरिक्ष में फैल जाते हैं और यह नए टुकड़े फिर किसी अन्य सेटेलाइट से टकराते हैं और अंतरिक्ष में इन टुकड़ों की संख्या बढ़ती जा रही है इसी अवस्था को Kessler syndrome, कहते हैं जिससे और नए-नए टुकड़े बनते जाते हैं और ऐसे ही अंतरिक्ष में इन टुकड़ों की संख्या बढ़ती ही जा रही है जिससे हजारों नए टुकड़े हर रोज उत्पन्न हो रहे हैं और जैसे-जैसे टुकड़ों की संख्या बढ़ती जा रही है इससे काम कर रहे सेटेलाइट या कोई पृथ्वी से अंतरिक्ष में भेजे जा रहे हैं अंतरिक्ष यान को टकराने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है।

इसी तरह 2007 में चीन ने एक Anti-satellite weapons का परिक्षण किया, जिससे उसने अपने ही एक मौसम की जानकारी देने वाले उपग्रह को अंतरिक्ष में ही नष्ट कर दिया, इससे पैदा हुए कचरे के हजारों टुकड़े अंतरिक्ष में आज भी तैर रहे हैं। और इस तरह सैटेलाइट के आपस में टकराने से या इनके टुकड़ों, पिंडों के सैटेलाइट, स्पेस स्टेशन आदि से टकराने से धात्विक टुकड़ों के रूप में अंतरिक्ष कचरा बढ़ता ही जा रहा है।

Space Debris Satellites – Future Of Satellites In Hindi

संयुक्त राष्ट्र के स्पेस सर्विलांस नेटवर्क के अनुसार स्पेस में 10 सेंटीमीटर से बड़े लगभग 23000, एक सेंटीमीटर से बड़े लगभग 5 लाख और एक मिलीमीटर से बड़े 1 करोड़ से भी ज्यादा ऐसे टुकड़े हैं। इनको लीडर (रडार और ऑप्टिकल डिटेक्टर का मेल) नाम के उपकरण से ट्रैक किया जाता रहा है। ये मलबा स्पेस के लिए काफी खतरनाक हो सकता है, इसका वजह है इसकी speed यह हमारे अंतरिक्ष में लगभग 5 मील प्रति सेकंड की तेज गति से घूमते रहते हैं। ऐसे में तेज गति से घूमते हुए ये मलबा स्पेस स्टेशन या फिर रॉकेट से टकरा गए तो काफी नुकसान हो सकता है।

बढ़ सकता है खतरा

यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) का कहना है कि यदि उपग्रहों और रॉकेटों से होने वाले अंतरिक्ष के कचरे को पृथ्वी की कक्षा से साफ नहीं किया गया तो दुर्घटनाओं का खतरा और अधिक बढ़ता जाएगा। इससे उपग्रह (Future Of Satellites In Hindi) ऑपरेटरों को करोड़ों का नुकसान हो सकता है, इसके साथ ही मोबाइल और GPS नेटवर्क भी ठप पड़ सकता हैं। उपग्रहों की सहायता से ही देश संचार के साधनों का लाभ ले पाते हैं। उपग्रहों (Future Of Satellites In Hindi) पर ही किसी देश के मोबाइल ,टीवी , इंटरनेट और अन्य संचार व्यवस्थाओं के साथ-साथ दूर शिक्षा, दूर चिकित्‍सा, ग्राम संसाधन केंद्र  व आपदा प्रबंधन प्रणाली (DMS) कार्यक्रम, डिफेंस सिस्टम निर्भर होते हैं।

ऐसे में यदि हमारी महत्वपूर्ण सैटेलाइट किसी कारण से इन अंतरिक्ष कचरे से टकरा जाती है, तो सोचिए कि धरती पर मानवो का क्या होगा? खासकर किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के समय। अगर उपग्रह आपस में टकराकर नष्ट हो जाएंगे या किसी अंतरिक्ष कचरे के टकराने से खराब हो जाएंगे तो इससे आम जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, अगर अंतरिक्ष कचरे का कोई बड़ा पिंड किसी घनी आबादी वाले शहर पर गिरता है, तो स्वाभाविक है इससे बड़ी जनहानि भी हो सकती है।

इसके अलावा और भी कई तरीकों से यह Satellite हमे नुकसान पहुंचाता है। वैज्ञानिकों को लगता है कि पृथ्वी की कक्षा (Orbit of Earth) में चक्कर लगा रहे कृत्रिम उपग्रह रात के आसमानों (Night Sky) की चमक बढ़ा रहे हैं। यह चमक (Brightness) जितना समझा जा रहा था उससे कहीं ज्यादा है। हाल ही में किए गए एक शोध के मुताबिक पृथ्वी का चक्कर लगा रही चीजों की संख्या हमारे पूरे ग्रह के ऊपर के आसमान की चमक 10 प्रतिशत तक बढ़ा रहे हैं। यह शोध Monthly Notices of the Royal Astronomical Society में प्रकाशित किया गया था। 40 साल पहले खगोलविदों ने एक सीमा तय की थी, अब यह सीमा पार हो गई है जिससे आसामान अब प्रकाश प्रदूषण से ग्रस्त हो गया है।

ध्वनि से भी 24 गुना तेज है स्पीड!

कुछ वैज्ञानिकों ने यह अनुमान लगाया है की, वर्तमान समय में अंतरिक्ष में करीब 700 टन से अधिक कचरा तैर रहा है। अंतरिक्ष वैज्ञानिको के अनुसार, अंतरिक्ष में परिक्रमा कर रहे हैं यह कचरे के पिंड 30,000 किलोमीटर प्रति घंटे के रफ्तार से तैर रहे हो सकते हैं। मतलब ध्वनि की गति से लगभग 24 गुना ज्यादा तेजी के साथ ये कचरा अंतरिक्ष में घूमता रहता है। और दोस्तों यह गति इतनी अधिक है कि ये टुकड़े किसी भी उपग्रहों, अंतरिक्ष शटलों, अंतरिक्ष स्टेशनों, spacewalk कर रहे अंतरिक्ष यात्री को भी चीरता हुआ निकल सकता है। इस रफ्तार पर छोटे से छोटा टुकड़ा भी विमान या उपग्रह जैसी चीज को नष्ट कर सकता है। और यह हमारे लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है। (Future Of Satellites In Hindi)

उदाहरण के लिए लगभग एक मिलीमीटर का एक टुकडा बेहद तेजी के साथ जनवरी 2017 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के खिड़की से टकराया था, जिससे खिड़की टूट गई थी। ऐसे ही एक और घटना सन 1996 में हुआ था जब फ्रांस का एक सैनिक उपग्रह अपनी कक्षा का चक्कर लगाते समय फ्रांस के एक ऐसे रॉकेट के टुकड़े से टकराया था, जो दस साल पूर्व एक विस्फोट से फट गया था।  इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए विश्व की तमाम स्पेस एजेंसियां भी मिलकर काम कर रही हैं। और इस समस्या का हल ढूंढने में लगी हुई है किंतु अभी तक इस समस्या हल, अंतरिक्ष के कचरे को साफ करने के अलावा और कोई नहीं नजर आ रहा है।

आखिर कहां जाते हैं ये खराब सैटेलाइट –

दरअसल जब इन उपग्रहों का उद्देश्य पूरा हो जाता है, उसके बाद भी ‘कॉस्मिक वेग’ के कारण यह उपग्रह अपनी उस कक्षा में ही चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन वायुमंडलीय ‘कर्षण (drag force) बल’ के कारण इनकी गति में धीरे धीरे कमी आने लगती है और नतीजा ये होता है की ये उपग्रह सर्पिलाकार पथ  पर परिक्रमा करते हुए पृथ्वी की ओर गिरने लगते हैं।

जब यह उपग्रह वायुमंडल के अपेक्षाकृत सघन हिस्से में प्रवेश करते हैं तो वायुमंडलीय घर्षण के कारण इतने अधिक ताप की उत्पत्ति होती है कि धातु के इन कचरों में पृथ्वी पर गिरने से पहले ही आग लग जाती है। और अंततः यह एक राख के रूप में बदलकर ये पृथ्वी की ओर गिरते हैं, लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि पिंड बड़ा होने के चलते पूरा नहीं जल पाता और पिंड या उपग्रह के ये अधजले टुकड़े धरती वासियों के लिए संकट पैदा कर देते हैं।

स्काईलैब रीएंट्री (1979) – ज्वलंत अंतरिक्ष कबाड़ की एक ओलावृष्टि। Credit – pastdaily.com

इसका एक उदाहरण है अमेरिकी अंतरिक्ष स्टेशन Skylab (स्काई लैब)‘ इसके कुछ अवशेष सन 1979 में हिंद महासागर और ऑस्ट्रेलिया के ऊपर आकर गिरे थे, हालांकि संयोग से उस समय कोई हादसा नहीं हुई। ऐसे ही सोवियत संघ का ‘मीर अंतरिक्ष स्टेशन‘ न्यूजीलैंड और चिली के बीच प्रशांत महासागर में 23 मार्च 2001 को अपना जीवनकाल पूरा करने के बाद पृथ्वी पर आ गिरा था। ऐसे ही एक और घटना इसी साल (2021) 2 अप्रैल को चीन के स्पेस स्टेशन ‘द तियांगोंग-1‘ के अवशेष जब दक्षिणी प्रशांत में आकर गिरा जिससे एक बार फिर उपग्रहों के कचरे से होने वाले खतरे की ओर धरती वासियों का ध्यान खींचा।

हाल ही में अंतरिक्ष में फैले रॉकेटों और उपग्रहों के टुकड़ों को हटाने के लिये चीन ने रिमूव डिब्री (Remove DEBRIS) नामक स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किया गया। चीन ने इस स्पेसक्राफ्ट को दक्षिण पश्चिम चीन के सिचुआन प्रांत के शीचांग सैटेलाइट लॉन्च सेंटर (Xichang Satellite Launch Centre) से लॉन्च किया। शिजियान-21 (Shijian-21) नाम के इस उपग्रह को लॉन्ग मार्च-3बी वाहक रॉकेट (Long March-3B carrier rocket) की मदद से लॉन्च किया गया और यह सफलतापूर्वक निर्धारित कक्षा में प्रवेश कर गया। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की खबर के अनुसार उपग्रह का उपयोग मुख्य रूप से अंतरिक्ष में मलबे को कम करने वाली टेक्नोलॉजी के परीक्षण और सत्यापन के लिए किया जाएगा।

क्या ये कचरा कभी साफ हो पायेगा?

दोस्तों सेटेलाइट (Future Of Satellites In Hindi) का काम जब खत्म हो जाता है या जब वे खराब हो जाते हैं तो वे सेटेलाइट नष्ट नहीं होते हैं बल्कि अंतरिक्ष में ही पृथ्वी के चारों तरफ घूमते रहते हैं और यह अंतरिक्ष के कचरे में शामिल हो जाता है जिससे अच्छे सेटेलाइट या कोई नए भेजे जा रहे स्पेसक्राफ्ट या रॉकेट से उसका टकराने का खतरा बना रहता है और इन सैटेलाइट को अंतरिक्ष से कैसे हटाया जाए यह वैज्ञानिकों के लिए एक सिरदर्द बना हुआ है हालांकि इसके लिए कई देशों ने अलग-अलग कदम उठाए हैं चीन ने इसके लिए रिमूव डिब्री (Remove DEBRIS) नामक स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किया है जो अंतरिक्ष के कचरे को साफ करेगा।

पर्यावरण-प्रेमी देश जापान ने स्पेस का कचरा कम करने के लिए अनूठी पहल की है। अंतरिक्ष के कचरा को कम करने के लिए जापान ने लकड़ी के सैटेलाइट पर काम शुरू कर दिया है। यहां रिसर्च की जा रही है कि कैसे लकड़ी का इस्तेमाल अंतरिक्ष में किया जा सकता है। क्योटो यूनिवर्सिटी और सुमिटोमो फॉरेस्ट्री (Kyoto University and Sumitomo Forestry) ने मिलकर इसपर काम भी शुरू कर दिया है वे चाहते हैं कि जल्द से जल्द ऐसा सैटेलाइट तैयार हो सके, जो स्पेस में कम से कम प्रदूषण करे।

अंतरिक्ष में सैटलाइट का मलबा, जो लगातार बढ़ ही रहा है। Credit : ESA

इसके अलावा अंतरिक्ष (Space) में फैले कचरे को खत्म करने के लिए जापान (Japan) ने एक चुंबकीय उपग्रह (magnetic satellite) को भी लॉन्च किया है।  इससे अंतरिक्ष में एकत्रित हुए कचरे की गणना की जाएगी ताकि कचरे को हटाया जा सके।  बताया जा रहा है कि दुनिया में पहली बार ऐसे हुआ है जब उपग्रह (Future Of Satellites In Hindi) निर्माण में चुंबक का इस्तेमाल किया गया। इस उपग्रह का नाम ELSA-D नाम है। इसे जापानी फर्म स्ट्रॉस्केल द्वारा बनाया गया है। इस उपग्रह में दो अंतरिक्षयान होंगे, जो ब्राह़मांड में ढेर सारे टेस्ट करेंगे।

वही अंतरिक्ष के इस कचरे को सभी देश अपने-अपने हिसाब से ट्रैक करते हैं। भारत के श्रीहरिकोटा के पास मल्टी ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार हैं। जिससे अंतरिक्ष के कचरे की ट्रैकिंग होती है। वहीं अमेरिका के पास भी ऐसे कई रडार मौजूद हैं। इस कचरे को इकट्ठा करने के लिए भी कई प्रयोग हुए हैं जिसके तहत इसे धरती पर लाकर जलाने जैसे प्रयोग किए गए हैं। लेकिन ये कितने कारगर हैं, इनपर कितना खर्च आएगा और इसपर अभी तक कितना काम हुआ है, इससे जुड़ी ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है।

Shivam Sharma

शिवम शर्मा विज्ञानम् के मुख्य लेखक हैं, इन्हें विज्ञान और शास्त्रो में बहुत रुचि है। इनका मुख्य योगदान अंतरिक्ष विज्ञान और भौतिक विज्ञान में है। साथ में यह तकनीक और गैजेट्स पर भी काम करते हैं।

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