Universe

अरबों-खरबों किलोमीटर दूर रहने वाले तारों को कैसे जान पाते हैं वैज्ञानिक!

How did science discover stars?

वैज्ञानिक टेलिस्कोप (Telescope)  की मदद से तारों (Stars)  और ग्रहों (Planets)  को कैसे खोजते हैं,और उनके तापमान और  रसायनों के बारे में जैसे की उनकी एटम और Elementsके बारे में कैसे बताते हैं। आइये इसे जानते हैं…

टेलिस्कोप (Telescope) कैसे काम करता है 

उदाहरण के लिए अगर आप एक साधारण टेलिस्कोप से चांद को मौजूद प्रकाश में देखना चाहतें है तभी देख सकते है जब चांद से लाइट टकराकर इस पर पड़ रही हो, मौजूद प्रकाश में देखने का मतलब है जैसा हम इंसान देखते हैं वैसा ही अगर  Infrared और X Rayका प्रयोग किया जाये तो आप चांद की बनाबट उसके तापमान और उसके रसायनों को जान सकते हो।

इसी तरह दूसरे तरह के टिलेस्कोप जैसे कि रेडियो टेलिस्कोप दूर से ब्रह्मांड से आ रही रेडियो तरंगो को पकड़कर उस चीज़ के बारे में और उसकी दूरी को बता सकते हैं। वास्तव में टेलिस्कोप ने हम इंसानो को वो आँखे दे दी हैं जिनसे हम करोड़ो लाइट ईयर दूर की आकाशगंगा और तारों को भी आसानी से देख सकते हैं।

तारों और ग्रहों को कैसे खोजते हैं

अब बात करते हैं आखिर वैज्ञानिक टेलिस्कोप की मदद से तारों और ग्रहों को कैसे खोजते हैं,और उनके तापमान और केमिकल कंपोजिशन जैसे की उनकी एटम और ऐलिमेंट्स के बारे में कैसे बताते हैं।।

अगर आप शहर से दूर किसी गांव में रात में आसमान  को देखें तो आपको लाखों तारे एक साथ दिखाई देंगें, जिनमेंसे कुछ आपको बहुत चमकीले तो कुछ एकमद धीमी चमक के भी दिखेंगे। आसमान में अगर आप अपने अंगुठे जितनी जगह को भी देखेंगे तो उसमें भी आपको हजारों गैलेक्सी और स्टार मिलेंगे पर आप उन्हें आँखो से देख नहीं सकते हैं, इसके लिए वैज्ञानिकों को टेलिस्कोप की मदद लेनी पड़ती है।

ऐस्ट्रोनोमी – Astronomy

जितने भी साइंस की ब्रांचइस हैं उनमें ऐस्ट्रोनोमी ही एकमात्र ऐसी ब्रांच है जिसमें सारा अध्ययन सिर्फ औवशर्वेशन पर टिका हुआ है। हम अपनी वेस्ट तकनीक से सूरज पर प्रोब भेज सकते हैं और तो और सौर मंडल से बाहर भी जा सकते हैं पर इस अनंत कल्पना से परे ब्रह्मांड के सामने यह सब कुछ नहीं है। तो ऐसे में हम कैसे दूसरी गैलेक्सीस के बारे में जान सकते हैं और कैसे हम यह पता कर सकते हैं कि ये कितनी पुरानी हैं और इनमें कमसेकम कितने तारे या स्टार्स हो सकते हैं और कितनी गैलेक्सी इस युनिवर्ष में हो सकती हैं।

तो इसके लिए हम आसामान में सबसे पहले दिखने वाली चीज़ स्टार्स की मदद ले सकते हैं, हम उनकी प्रोप्रटीज जैसे की वह कैसे बनें है, वे कितने गर्म हैं और कितने भारी हैं और वे कितने पुरानें है और साथ में वे पृथवी से कितने दूर हैं यह सब जानकार हम Galaxies का पता कर सकते हैं। आप शायद यकीन ना करें पर स्टार्स की ये सभी प्रोपर्टीज हम केवल उसमें से निकलने वाली लाइट से ही पता कर सकते हैं।

इंद्रधनुष (Rainbow)

आप शायद यकीन ना करें पर तारों के ये सभी गुण हम केवल उसमें से निकलने वाले प्रकाश से ही पता कर सकते हैं। इसके लिए तारों से आने वाली लाइट(प्रकाश)  का इंद्रधनुष (Rainbow) बनाना होगा जैसा हम सूर्य की लाइट का पृथ्वी पर देखते हैं, पर सूर्य पृथ्वी के पास है तो उसकी लाइट का इंद्रधनुष हमें पृथ्वी मैं मौजूद Water Droplets  यानि पानी की बूंदो से  प्रकाश के  बिखरने (Scatter)  होने से मिल जाता है, जिसमें हम सूर्य की एक सफेद लाइट में सात अलग अलग रंगो की लाइट भी देख पाते हैं जो  Electromagnetic Spectrum (विद्युत चुम्बकीय वर्णक्रम)  में अलग अलग Wavelength की होती हैं।

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ये तो थी सूर्य की बात पर वैज्ञानिक तो इसके जरिए हजारों प्रकाश वर्ष दूर चीज़ का पता लगाते हैं तो वह कैसे उस तारे की लाइट का रेनवौ देख पाते हैं, तो इसके लिए वैज्ञानिक पानी की बुंदो की जगह किसी खास तरह का Instrument इस्तेमाल करते हैं जिससे उस तारे की लाइट स्कैटर(बिखर)  हो जाती है जिससे वैज्ञानिकों को उस लाइट में छिपे दूसरे रंगो की लाइट का पता चल पाता है।

इंद्रधनुष और काली लाइंस – Dark Lines In Rainbow

अगर आप सूर्य के रैनवो को देखेंगे तो उसमें आपको इन सात अलग अलग रंगो की लाइटों की बीच में काली लाइंन्स भी दिखाई देंगी, दरअसल यही काले लाइंस के पैटर्न उस तारे के एटोमिक स्ट्रकचर (Atomic Structure)  यानि की उस तारे में कौन से ऐलीमेंट (Elements)  है वह बताते हैं।

हर एटम (atom)  एक अलग खास वैवलेंथ की लाइट को Absorb यानि की सोख लेता है और जितनी ज्यादा ये लाइट को सोखता है उससे ही वैज्ञानिक उस ऐटम के बारे में जान पाते हैं। तो रैनवो में सात अलग अलग वैवलेंथ में जितने ज्यादा काली लाइंस होगीं तो उसी हिसाब से वैज्ञानिक तारे में मौजूद एटम और उनकी मात्रा का भी पता लगा पाते हैं।

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अलग-अलग तारों के बने इंद्रधनुष – Spectroscopy @astro.uu.se

प्रकाश की दूसरी तरंगो से भी तारे खोजे जा सकते हैं

पर सिर्फ रैनवो और लाइट की स्कैटरिंग ही एकमात्र तकनीक नहीं है बल्कि रेडियो तरंगो से भी वैज्ञानिक बहुत कुछ जान सकते हैं, रेडियो टेलिस्कोप इन तरंगौ को पकड़कर हमें Universe (ब्रह्मांड)  का वह इतिहास बता सकते हैं जो हमने आज तक नहीं जाना है, इसी तरह दुसरी सभी लाइट्स जैसे अवरक्त (Infrared)  और ऐक्स रे (X-ray)  इन सब से भी टेलिस्कोप तारों का पता लगाते हैं और उनका अध्यन करते हैं।

इंफ्रारेड से हम गैसे के बड़े बादलों यानि  की Nebula में छिपे तारे का भी अध्ययन कर सकते हैं और Ultraviolet किरणों से हम किसी भी गर्म पिंड और तारे के बारे में जान सकते हैं। यानि की अगर हम अलग –अलग वैवलेंथ में टेलिस्कोर से तारों को देखें तो हम उनके बारे में अपनी लैव में बैठ कर ही बहुत कुछ जान सकते हैं।

पर टेलिस्कोप की भी अपनी एक लिमिट है वह वास्तव में बहुत बड़े पिंड को ही देख सकते हैं, जैसे की स्टार्स (तारे) और बड़े – बड़े नेवुला( अरबों तारों की धूल)  और गैआकाशगंगा। हमने जितने भी टेलिस्कोप आज तक बनाये हैं वे सभी केवल बड़े स्टारस्, गैलेक्सीस के ग्रुप्स जिन्हें सुपरकलस्टर (Galaxy Superclusters)  कहते हैं उन्हीं की High Resolution Image ले पाते हैं।

ग्रहों और छोटी वस्तू को खोजना आज भी असंभव

ऐसे में ग्रहों को खोजना एक बहुत बड़ी समस्या बन जाती है। वैज्ञानिक केवल उन्हीं ग्रहों को देख पाते हैं जो अपने तारे के ज्यादा नजदीक हों और जिसके परिक्रमा करने के कारण तारे की लाइट कम ज्यादा होती हो ऐसे में जब ग्रह तारे के नजदीक आकर टेलिस्कोप में आने वाली लाइट कम करेगा तो तभी वैज्ञानिक वहां पर एक ग्रह होने की बात कह सकते हैं। देखा जाये तो ग्रहों को खोजना बहुत बड़ी बात है क्योंकि एक तो वह आकार में बहुत छोटे होते हैं तो दूसरा उनका खुद का कोई प्रकाश नहीं होता है।

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Team Vigyanam

Vigyanam Team - विज्ञानम् टीम

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