Environment

आखिर पृथ्वी का वायुमंडल क्यों है? – Why Does Earth Have an Atmosphere?

पृथ्वी पर वातावरण क्यों बना, क्यों इसने जीवन को जन्म दिया और क्यों ये सबसे अनोखा है?

पृथ्वी का वायुमंडल बहुत विशाल है, इसका प्रभाव अंतरिक्ष स्टेशन से लेकर के चंद्रमा तक दिखाई दे सकता है, वायुमंडल के बिना किसी भी ग्रह पर जीवन की कल्पना करना भी असंभव है, इसके बिना ना तो ग्रह पर हवा होती है और ना ही हम मौसमों को देख सकते हैं, पर आकार में बहुत विशाल और पूरी पृथ्वी को एक आवरण की भांति समाये रखना वाला वायुमंडल (Earth Have an Atmosphere) वास्तव में क्या है और क्यों है, ये क्यों बना और क्यों पृथ्वी पर ये जरूरी माना जाता है, इन्हीं सभी बातों को हम आज के इस लेख में समझेंगे..

अब पृथ्वी पर वातावरण(Atmosphere) क्यों है तो इस सवाल का जबाव अगर सीधे-सीधे दिया जाये तो इसके पीछे ग्रेविटी को जिम्मेदार माना जाता है। पर वैज्ञानिकों की मानें तो उनका कहना है कि आज से 4.5 अरब वर्ष पूर्व जब पृथ्वी का जन्म हो रहा था तो उस समय इस पिघलते हुए ग्रह पर वायुमंडल का कोई नामो-निशान नहीं था, लेकिन जैसे ही ये ग्रह ठंडा होने लगा तो इसमें मौजूद ज्वालामुखी की गैसों ने इसका निर्माण शूरु कर दिया और धीरे- धीरे एक विशाल वायुमंडल का जन्म इस ग्रह पर हो गया।

4.5 अरब वर्ष पृथ्वी एकदम पिघली सतह जैसे थी।

कैसा था प्राचीन वातावरण

बात करें प्राचीन वायुमंडल की तो वो आज के वातावरण से बहुत अलग था; SERC के अनुसार, इसमें हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन और आधुनिक वातावरण की तुलना में 10 से 200 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड था। कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि पृथ्वी की आरंभिक अवस्था में वायुमंडल ठीक वैसा ही था जैसा की आज हम शुक्र ग्रह पर देखते हैं। नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और शायद मीथेन के साथ यहां पर वायुमंडल बना और फिर किसी तरह समुद्र के तल में जीवन पनपा।

लगभग 3 अरब वर्षों के बाद, पृथ्वी पर प्रकाश संश्लेषण की पक्रिया विकसित हुई, जिससे सिंगल-सैल जीवों ने कार्बन डाइऑक्साइड और पानी के अणुओं को चीनी और ऑक्सीजन गैस में बदलने के लिए सूर्य की ऊर्जा का उपयोग किया। इससे नाटकीय रूप से पृथ्वी पर ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगी जिससे धीरे-धीरे पूरे ग्रह की कायाकल्प हो गई, पूरा ग्रह बदल गया और सिंगल सैल जीवों से मल्टीसैल वाले जीव भी पैदा होने लगे। आज के समय में पृथ्वी के वायुमंडल (Earth Have an Atmosphere) में 80 प्रतिशत नाइट्रोजन है तो 20 प्रतिशत ऑक्सीजन है इसके साथ-साथ ये आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, जल वाष्प (Water Vapor) और कई अन्य गैसों का भी घर है।

हमारा वायुमंडल पृथ्वी को सूर्य की कठोर किरणों से बचाता है और तापमान के चरम को कम करता है, ग्रह के चारों ओर लिपटे एक कंबल की तरह काम करता है। पर ग्रीनहाउस गैसों के कारण हमारा ग्रह काफी गर्म भी हो रहा है। सूर्य से आ रही किरणे जब पृथ्वी पर आती हैं तो उसमें जो उर्जा होती है वो पृथ्वी के वायुमंडल में अवशोषित हो जाती है जिससे वातावरण गर्म होता रहता है।

ग्रीनहाइस गैसे इसमें मदद करती हैं और इस उर्जा को पकड़कर पृथ्वी को गर्म करती हैं, वातावरण में बढ़ रही कार्बन डाइऑक्साइड, जल वाष्प, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड इसे और ज्यादा तीव्र कर देती हैं।

ग्रीनहाउस इफैक्ट का प्रभाव, गैसें सूर्य की हीट को पृथ्वी के वातावरण में मिला देती हैं,

पर ग्रीनहाउस इफैक्ट भी जरूरी है इसके बिना पृथ्वी का तापमान शून्य से नीचे होगा और सबकुछ जम जायेगा जो कि जीवन के पनपने के लिए बहुत घातक है। ग्रीनहाउस गैसे कैसे किसी ग्रह के वायुमंडल को नर्क बना देती हैं इसे आप शुक्र ग्रह पर देख सकते हैं, शुक्र इन्हीं गैसों के कारण सौर-मंडल का सबसे गर्म ग्रह है और यहां पर मानव मिशन करना लगभग असंभव है, आज से 4 अरब वर्ष पूर्व शुक्र ग्रह भी काफी हैविटेवल ग्रह था।

ब्रह्मांड के किसी अन्य ग्रह पर नहीं है पृथ्वी जैसा वायुमंडल !

दिलचस्प बात यह है कि ब्रह्मांड के किसी अन्य ग्रह में पृथ्वी जैसा वातावरण नहीं है। मंगल और शुक्र (Venus) के पास वायुमंडल है, लेकिन वे जीवन को पनपने नहीं दे सकते हैं, क्योंकि उनके पास पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं है। दरअसल, शुक्र का वायुमंडल मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड है जिसमें सल्फ्यूरिक एसिड के बादल हैं, ‘हवा’ इतनी मोटी और गर्म है कि कोई भी इंसान वहां सांस नहीं ले सकता। नासा के अनुसार, शुक्र का गाढ़ा कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण (Earth Have an Atmosphere) एक ग्रीनहाउस प्रभाव में गर्मी को फंसाता है, जिससे यह हमारे सौर मंडल का सबसे गर्म ग्रह बन जाता है। वहां की सतह का तापमान सीसा को पिघलाने के लिए काफी गर्म होता है।

शुक्र ग्रह पर गर्जना, एक कलाकार की छवि, क्रेडिट – © ESA / J. Whatmore

वहीं दूसरे ग्रहों जैसे की मंगल के वातावरण को देखें तो उसमें आप 95% कार्बन डाइऑक्साइड और केवल 1 प्रतिशत ही ऑक्सीजन को  पायेंगे, मंगल पर ग्रेविटी भी पृथ्वी की एक तिहाई है इसलिए इसका वायुमंडल (Atmosphere Of Earth Hindi) काफी पतला है, इस ग्रह पर साँस नहीं ले सकते हैं।

यहां पर पृथ्वी के प्राणी भी जीवित नहीं रह पायेंगे, बाकी विशाल ग्रह गैस से बने हुए हैं तो उनपर जीवन की कल्पना आप कभी नहीं कर सकते हैं, उनपर कोई ठोस सतह नहीं है इसलिए इन पर मानव मिशन भी लगभग मुश्किल ही है। विशाल गैसीय ग्रहों पर हम जीवन की कल्पना केवल उनके चंद्रमाओं पर ही कर सकते हैं, शनि ग्रह का चंद्रमा टाइटन भविष्य में मानवों के लिए एक घर हो सकता है। हालांकि इस समय इसके वायुमंडल (Earth Have an Atmosphere) में 95 प्रतिशत तक नाइट्रोजन है और केवल 5 परसेंट ही मिथेन है इसलिए इस चंद्रमा पर बना वायुमंडल बहुत घना है पर जीवन के लाइक नहीं है। भविष्य में जब सूर्य एक रेड जाइंट स्टार बनेगा तब शायद ये चंद्रमा हमारे लिए एक रहने लाइक जगह बन सके।

पृथ्वी का वायुमंडल और उसकी विशेषताएं

सौर मंडल में केवल पृथ्वी पर ही जीवन है तो ऐसे में हम कह सकते हैं कि ये जीवन केवल और केवल पृथ्वी के सबसे अनोखे वायुमंडल के कारण ही है, पृथ्वी पर बनी परिस्थतियाँ और दवाब के कारण ही मैं और आप इस ग्रह पर जीवन जी रहे हैं, शुक्र पर वायुमंडल का दवाब पृथ्वी से 90 गुना ज्यादा है।

ये इतना है कि कि आपको लगेगा कि जैसे आप 3000 फीट समुद्र के नीचे खडे है ये दबाब ही किसी भी चीज़ को कुचलने के बराबर है। इसी कारण कोई भी मिशन इस ग्रह पर 2 घंटो से ज्यादा टिक नहीं सका है। पृथ्वी को जीवन आरंभ करने के लिए सही वायुमंडल की आवश्यकता थी। उसने वह वातावरण (Atmosphere Of Earth Hindi) बनाया है, और उस वातावरण में रहने के लिए परिस्थितियों का निर्माण किया है। वातावरण जैविक प्रणाली का एक अभिन्न अंग है।

Shivam Sharma

शिवम शर्मा विज्ञानम् के मुख्य लेखक हैं, इन्हें विज्ञान और शास्त्रो में बहुत रुचि है। इनका मुख्य योगदान अंतरिक्ष विज्ञान और भौतिक विज्ञान में है। साथ में यह तकनीक और गैजेट्स पर भी काम करते हैं।

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