हिन्दू महिलाएं पैर में क्‍यों पहनती है बिछिया, जानें इसकी वैज्ञानिकता

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हिन्दू धर्म वैज्ञानिक आधार पर बना हुआ धर्म है, यहां हर प्राचीन रिति रिवाज जो ऋषि -मुनियों द्वारा वेदों में कहे गये हैं सभी वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरे उतरते हैं और हमें लाभ प्रदान करते हैं।

हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण रिवाज है महिलाओं द्वारा सौलह श्रृंगार का रिवाज। जिसमें माथे की बिंदिया से लेके पैर की बिछिया तक सब महत्वपूर्ण है, सबका अपना अपना महत्व होता है।

इन्हीं में से पैर में पहने जानें वाली बिछिया भी हिन्दू परंपराओं के अनुसार तो महत्व रखती ही है, साथ ही इसके वैज्ञानिक महत्व भी होते हैं।

हिन्दू धर्म में विवाह होने पर वधु को पैर की उंगलियों में बिछिया पहनाई जाती है। इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क है कि पैर की उंगलियों का सीधा संबंध महिला के गर्भाशय से होता है। अत: एक्यूप्रेशर के कारण बिछिया गर्भाशय को लाभ पहुंचाती है।

गर्भाशय का कार्य गर्भ धारण करना है। विवाह पश्चात अवश्य ही गृहस्थ जीवन में वधु को समयकाल बीतने पर गर्भधारण होता है। जब गर्भ पूर्ण हो जाता है तो 9 महीने पश्चात प्रसव होता है। प्रसव प्रक्रिया में गर्भाशय की मांशपेशियों में खिंचाव दबाब होता है।

तो बिछिया के कारण पैर की उंगलियों में दवाब पड़ते रहने से, उन उगलियों से जुडी नसे गर्भाशय की मांसपेशियों के खिंचाव में लचीलापन पैदा करती है, जिससे, नार्मल प्रसव प्रक्रिया आसानी से पूर्ण होती है, अत: अक्सर आपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

शास्त्रों में भी है बिछिया का जिक्र 

शास्त्रों में भी कहा गया है कि दोनों पैरों में चांदी की बिछिया पहनने से महिलाओं को आने वाली मासिक चक्र नियमित हो जाती है। इससे महिलाओं को गर्भ धारण में आसानी होती है।

चांदी विद्युत की अच्छी संवाहक मानी जाती है। धरती से प्राप्त होने वाली ध्रुवीय उर्जा को यह अपने अंदर खींच पूरे शरीर तक पहुंचाती है, जिससे महिलाएं तरोताज़ा महसूस करती हैं।

बिछिया के अलावा प्रसव में इसका भी महत्व 

सामान्य प्रसव हो सके, इसलिये पहले भारत के घरों में पत्थर की चक्की होती थी, जिस पर महिला ही गेहू डालकर पीसकर आटा बनाती थी।

तो इस पीसने की प्रक्रिया में जमीन पर पैर फैलाकर, बैठकर्, चक्की को गोल घुमाते थे, जिससे महिला के पेट और कमर पर अत्याधिक दवाब पड़ता था और इन स्थानों की माँस्पेशियो में लचीलापन, मजबूती पैदा होती थी, जिसका लाभ नार्मल प्रसव में होता था।

ये चक्की चालाना इस तरह से एक व्यायाम होता था, जो विवाहित महिला को गृहस्थ जीवन के लिये शारीरिक रूप से तैयार कर देता था।

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