Environment

आपके द्वारा किया गया एक गूगल सर्च बढ़ा सकता हैं प्रदूषण, आखिर कैसे ? – Internet Pollution In Hindi

हर एक गूगल सर्च से निकलता हैं लगभग 0.2 ग्राम CO2 ! परिवेश पर पड़ रहा हैं इसका दुष्परिणाम।

आज के इस समय में भला कौन इंटरनेट की असीमित ताकतों से परचित नहीं हैं, आज का समाज लगभग हर एक काम के लिए इंटरनेट पर आश्रित हैं। विज्ञान की विकास और तकनीक में आधुनिकता के चलते इंटरनेट आज हर एक घर में प्रवेश कर चुका हैं। बिना इंटरनेट (internet pollution in hindi) के शायद कोई आज रह ही नहीं सकता। मनोरंजन से लेकर खरीददारी तक, हर एक काम हम इंटरनेट के जरिए घर बैठे कर सकते हैं। वैसे इंटरनेट का सही उपयोग हमारे लिए वरदान बन के साबित हुआ हैं, परंतु इसके कुछ ऐसे पक्ष भी हैं जो इसे कई बार एक संकट के रूप में भी तबदील करता आया हैं।

वैसे मेँ यहाँ पर इंटरनेट की दुरुपयोग के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ, मेँ यहाँ पर बात कर रहा हूँ इंटरनेट प्रदूषण की (internet pollution in hindi)। जी हाँ ! दोस्तों कारखानों और जीवाश्म ईंधन पर चलने वाली वाहनों की तरह ही यह जो इंटरनेट हैं यह भी परिवेश को प्रदूषित करता हैं। यूं तो यह बात बहुत सारे लोगों को यकीन नहीं आयेगा, परंतु यह बात पूर्ण रूप से सत्य हैं और उतनी ज्यादा महत्वपूर्ण भी।

आपकी एक गूगल सर्च भी परिवेश को प्रदूषित करने में अहम हिस्सा निभा रहा हैं। 2016 तक पूरे विश्व में लगभग 3.4 अरब इंटरनेट के यूसर थे और 2019 तक सिर्फ भारत में ही करीब-करीब 54 करोड़ लोग इंटरनेट को इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसे में इंटरनेट के प्रदूषण के विषय को ऐसे ही सामान्य तौर पर देखना सही भी नहीं हैं।

तो, चलिये आज के इस लेख में हम लोग इसी अनोखे विषय पर प्रकाश डालते हैं और जानते हैं इसके हर एक पहलू को।

इंटरनेट प्रदूषण क्या हैं ? – What Is Internet Pollution In Hindi ? :-

सरल भाषा में कहूँ तो, इंटरनेट के लिए इस्तेमाल होने वाले डैटा सेंटर (Data Center) के नियमित रूप से गरम व ठंडा करने प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को ही इंटरनेट प्रदूषण (internet pollution in hindi) कहते हैं। वैसे बता दूँ की डाटा सेंटर एक ऐसे जगह होती हैं जहां पर इंटरनेट पर मौजूद डाटा को जुटाया व प्रोसेस तथा गच्छित कर के रखा जाता हैं। वैसे इतने भारी मात्रा में मौजूद डैटा को कोई आम साधारण कम्प्यूटर प्रोसेस व संग्रह करके नहीं रख सकता हैं।

इसलिए डाटा सेंटर के अंदर अकसर सुपर कम्प्युटर को इस्तेमाल किया जाता हैं। आम कम्प्यूटर से हजार गुना ताकतवर और अनेक कार्य को एक साथ करने में कुशल यह कम्प्यूटर बहुत ही तेजी से डाटा को इंटरनेट के बहुत सारे सर्वरों के अंदर एक साथ डालते हैं। इसी वजह से इन्हें 24 घंटे काम करना रहना पड़ता हैं, क्योंकि अगर यह बंद हो गए तो पूरा इंटरनेट ही बंद पद जाएगा। वैसे इतने ताकतवर कम्प्यूटर को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली का उपयोग होने के साथ ही साथ इन्हें ठंडा करने के लिए भी ऊर्जा का उपयोग होता हैं।

आम कम्प्यूटर के मुक़ाबले सुपर कम्प्यूटर बहुत ही जल्द बहुत ज्यादा गरम हो जाते हैं। वैसे बता दूँ की, कुछ पलों के लिए भी अगर इंटरनेट बंद पड़ जाता हैं तो कई सारे कंपनीओं को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता हैं। इसलिए अकसर कंपनीयां डाटा सेंटर के ऊपर खास ध्यान रखती हैं।

Improvment in cloud services reduce pollution.
क्लाउड सर्विसेस की इंटरनेट प्रदूषण में हैं अहम भूमिका | Credit: Network World.

डाटा सेंटर कैसे बढ़ाती हैं प्रदूषण ! :-

आज आप जिस ई-मेल या क्लॉउड स्टोरेज के सेवाओं को अपने स्मार्ट फोन या कम्प्यूटर के अंदर इस्तेमाल कर रहें हैं, वह हमारे देश से दूर विदेश में एक सर्वर से जुड़ा हुआ हैं। जहां पर आपके मोबाइल में मौजूद डाटा को इंटरनेट के जरिये वहाँ पर संग्रह करके रखा जाता हैं। वैसे ऐसे कई सारे सर्वर आज पूरे पृथ्वी पर मौजूद हैं, जिन्हें आप डाटा सेंटर भी कह सकते हैं। देखने में यह सेंटर एक बहुत ही बड़े हाल जैसा दिखता हैं, जहां पर कतारों से बड़े-बड़े इलेक्ट्रोनिक उपकरण और तार आपस में कनैक्टेड होते हैं।

वैसे इन्हें हमेशा चलने के लिए बिजली की बहुत ज्यादा जरूरत पड़ती हैं, जो की एक साधारण दफ्तर के मुक़ाबले 100 गुना से भी ज्यादा होता हैं। ऐसे में कार्बन फूट प्रिंट की मात्रा भी बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं। बता दूँ की, कार्बन फूट प्रिंट एक तरह से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को मापने की इकाई होती हैं, जो की कंपनियाँ तथा किसी व्यक्ति विशेष की कार्बन उत्सर्जन के मात्रा को नापती हैं। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं की, अगर कोई डाटा सेंटर ऊर्जा की हद से ज्यादा खपत कर लेता हैं तो कितना ज्यादा प्रदूषण होगा।

पहले के जमाने में डाटा सेंटर के अंदर ऊर्जा की बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने वाले बड़े-बड़े कम्प्यूटर को इस्तेमाल किया जाता था,  इससे इंटरनेट (internet pollution in hindi) तो चालू रहता था परंतु ऊर्जा के उपयोग का प्रबंधन सही से नहीं होने के कारण परिवेश बहुत ज्यादा प्रदूषित होती थी। इसलिए आज के इस आधुनिक युग में ऊर्जा की कम खपत करने वाले कम्प्यूटर को डाटा सेंटर में इस्तेमाल किया जा रहा हैं तथा सर्वर भी पहले की मुक़ाबले काफी ज्यादा बेहतर हो गए हैं, जो की इनके कार्य-कुशलता का बखान करता हैं।

आपका सिर्फ एक गूगल सर्च भी बढ़ा रहा हैं परिवेश प्रदूषण को ! :-

हमारे द्वारा किए जाने वाले हर एक गूगल सर्च हमारे परिवेश तथा पृथ्वी के लिए दिन प्रति दिन काफी महंगी पड़ती जा रहीं हैं। एक दिन में लगभग गूगल पर 3.5 अरब से ज्यादा सर्च किए जाते हैं, और एक गूगल सर्च में लगभग 0.2 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता हैं। इसलिए इंटरनेट प्रदूषण का एक बहुत बड़ा हिस्सा (40%) सिर्फ और सिर्फ गूगल सर्च के जरिये ही आती हैं।

हर एक सेकंड गूगल पर 47,000 से ज्यादा सर्च रीक्वेस्ट आते हैं, जो की हर सेकंड 500 किलो तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता हैं। एक सोध से यह भी पता चला हैं की, अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से एक महीने तक इंटरनेट का इस्तेमाल करता हैं तो वह एक मिल दूरी तक चली कार से निकलने वाले प्रदूषण (कार्बन डाइऑक्साइड) के साथ समान हैं। जो की लगभग 360 ग्राम के आसपास हैं।

वैसे एक ब्रिटिश पत्रिका में यह भी प्रकाशित किया गया था की, इंटरनेट प्रदूषण (internet pollution in hindi) की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ रहा हैं। वैसे अगर कोई व्यक्ति अपने कम्प्युटर को ऑफ से ऑन करता हैं  (इंटरनेट के लिए इस्तेमाल होने वाली अन्य उपकरणों को भी) तो वह एक सर्च में लगभग 1 ग्राम से लेकर 10 ग्राम तक कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा देता हैं। हालांकि गूगल के हिसाब से 2007 से ही वह अपने डाटा सेंटर के अंदर ऊर्जा के प्रबंधन को बेहतर बनाने में सक्षम रहा हैं परंतु अभी भी इंटरनेट प्रदूषण जैसे विषय को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता हैं।

One google search emmits 0.2 g of CO2.
गूगल सर्च और 0.2 ग्राम CO2 उत्सर्जन | Credit: UX Collective.

इंटरनेट प्रदूषण को कैसे कम किया जा साकता हैं ! :-

वैसे हाल ही में कई सारे कंपनीयों ने इंटरनेट से हो रही कार्बन फूटप्रिंट को कम करने के लिए, एक बहुत ही बड़े फैसले को हकीकत में लाने का निर्णय लिया हैं। उनके तहत आने वाले समय में क्लाउड सर्विसेस (Cloud Services) को बेहतर बनाया जाएगा जो की आज के तुलना में 87% ऊर्जा की कम खपत करेगा। ऐसे में जीतने भी दफ्तर या सरकारी काम हैं सब के सब क्लाउड स्टोरेज के आधार पर किए जाएंगे।

इससे ऊर्जा तो बचेगा ही परंतु साथ ही साथ कागजों की इस्तेमाल में भी कमी आएगी, जिससे डिजिटल दुनिया के आधार पर जंगलों तथा परिवेश को फिर से बचाया जा सकेगा। इसलिए कई कंपनियाँ अभी से ही ग्रीन डाटा सेंटर” (Green Data Center) बनाने के लिए जुट गई हैं। गूगल तो ऐसे डाटा सेंटर हर जगह खोलने की सोच रही हैं। वैसे मित्रों ! इसको लेकर आपका क्या ख्याल हैं ! क्या यह आधुनिक डाटा सेंटर हमारे परिवेश को बचाने के लिए पर्याप्त होंगे ? क्या हम लोग इंटरनेट को बिना किसी झिझक के जितना चाहे उतना इस्तेमाल कर पाएंगे ? जरूर ही बताइएगा।

Sources :- www.qz.com, www.colocationamerica.com.

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Bineet Patel

मैं एक उत्साही लेखक हूँ, जिसे विज्ञान के सभी विषय पसंद है, पर मुझे जो खास पसंद है वो है अंतरिक्ष विज्ञान और भौतिक विज्ञान, इसके अलावा मुझे तथ्य और रहस्य उजागर करना भी पसंद है।

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