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रहस्यमयी लेपाक्षी मंदिर, विज्ञान और धर्म भी नहीं सुलझा सके इस मंदिर की पहेली

लेपाक्षी आंध्रप्रदेश राज्य के अनंतपुर में स्थित एक छोटा सा गांव है। पौराणिक मान्यता है की यह रामायणकालीन वही जगह है जहां रावण से युद्ध के पश्चात घायल हो के जटायू गिरा था। यह गांव 16वीं शताब्दी में बने अपने कलात्मक लेपाक्षी मंदिर के लिए जाना जाता है। यह मंदिर काफी बड़ा है तथा इस मंदिर परिसर में भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान वीरभद्र को समर्पित तीन मंदिर है।

लेपाक्षी मंदिर को हैंगिंग पिलर टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कुल 70 खभों पर खड़ा है जिसमे से एक खंभा जमीन को छूता नहीं है बल्कि हवा में ही लटका हुआ है। इस एक झूलते हुए खंभे के कारण इसे हैंगिंग टेम्पल कहा जाता है। यह पिलर भी पहले जमीन से जुड़ा हुआ था पर एक ब्रिटिश इंजीनियर ने यह जानने के लिए की यह मंदिर पिलर पर कैसे टिका हुआ हुआ है, इसको हिला दिया तब से यह पिलर झूलता हुआ ही है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मान्यता है की इसके नीचे से कपडा निकलने से सुख सृमद्धि बढ़ती है।

इस मंदिर का निर्माण 1583 में दो भाइयों विरुपन्ना और वीरन्ना ने करा था जो की विजयनगर राजा के यहां काम करते थे। हालांकि पौराणिक मान्यता यह है की लेपाक्षी मंदिर परिसर में स्थित विभद्र मंदिर का निर्माण ऋषि अगस्तय ने करवाया था।

एक अन्य मान्यता यह है की यह रामायणकालीन वही स्थान है जहां रावण से युद्ध के पश्चात घायल हो के जटायू गिरा था। जब राम सीता को तलाशते हुए वहां पहुंचे तो उन्होंने उस घायल पक्षी को देख कर कहा ले पाक्षी यानी की उठो पक्षी। ले पाक्षी एक तेलगु शब्द है।

लेपाक्षी मंदिर में देखने लायक कई चीजे है जो की कलात्मक दृष्टि से बेहद उत्कृष्ट है।

नंदी की सबसे विशाल प्रतिमा – लेपाक्षी मंदिर से 200 दूर मेन रोड पर एक ही पत्थर से बनी विशाल नंदी प्रतिमा है जो की 8. 23 मीटर (27 फ़ीट) लम्बी, 4.5 मीटर (15 फ़ीट) ऊंची है। यह एक ही पत्थर से बनी नंदी की सबसे विशाल प्रतिमा है जबकि एक ही पत्थर से बनी दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा है (प्रथम स्थान गोमतेश्वर की मूर्ति का है)।

विशाल नाग लिंग प्रतिमा- विभद्र मंदिर परिसर में एक ही पत्थर से बनी विशाल नागलिंग प्रतिमा भी स्थापित है जो की संभवतया सबसे विशाल नागलिंग प्रतिमा हैं। इस काले ग्रेनाइट से बनी प्रतिमा में एक शिवलिंग के ऊपर सात फन वाला नाग फन फैलाय बैठा है।

राम पदम- विभद्र मंदिर परिसर में स्तिथ राम पदम जबकि कइयों का मानना है की यह माता सीता के पैरों के निशाँ है।

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शिव काल की प्लेटों के निशान-कहा जाता है की यह शिव काल में प्रयोग में ली गई प्लेटों और बर्तनो के निशान साथ में है भगवान राम के पद चिन्ह। जबकि कुछ अन्यों की मान्यता है की यह विशाल कलर प्लेटे है जो की यहां चित्रकारी करने में काम ली गई थी1583 में हुआ था निर्माण-

भगवान गणेश की मूर्ति, लाइमस्टोन का ढेर, मंदिर परिसर में एक जगह मंदिर निर्माण के दौरान बचे चुने पत्थर का एक ढेर है जिसकी भी श्रद्धालु पूजा करते है।

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