
Hindu Dharma Ka Sabse kathin Sawal – आज विश्व के तरक्की करने का सारा श्रेय इंसान की मेहनत और लगन को जाता है। परन्तु सच तो ये है कि यदि इंसान समस्याओं को ही नही जान पाता तो उनका हल कैसे निकालता।
मनुष्य के दिमाग में ऐसे ही कुछ न कुछ प्रश्न चलते रहते हैं जिनका जवाब जब इंसान ढूंढ लेता है तो उसे सफल इंसान माना जाता है।
पूरे विश्व में प्रश्न और उत्तर का सिलसिला तो हमेशा से ही चलता आ रहा है और चलता रहेगा। परन्तु कभी-कभी ऐसा होता है जब कोई हमसे ऐसा प्रश्न पूछ लेता है जिसका जवाब दे पाना हमारे लिए बहुत मुश्किल होता है या उस प्रश्न का जवाब ढूंढने में हमें बहुत समय लग जाता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा ही एक प्रश्न था जिसका जवाब देने के लिए आठ पीढ़ियाँ लगी थी। तो आइए जानते है उस प्रश्न के बारे में :
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क्या है प्रश्न की कहानी?
प्राचीन भारत में दार्शनिक एवं धार्मिक वाद-विवाद, चर्चा या बातचीत सशास्त्र कहलाती थी। वैदिक काल में ज्ञान अपने चरम पर था। इसलिए सशास्त्र करवाए जाते थे क्योंकि सशास्त्र ज्ञानवृद्धि के लिए किए जाते थे।
यह कहानी है आदि पुराण की जिसमें एक आश्रम में एक विद्वान ऋषि कछिवान रहते थे। जिन्हें विभिन्न तरह के शास्त्रों और पुराणों का अत्यंत ज्ञान था। एक दिन ऋषि कछिवान अपनी ही तरह विद्वान ऋषि प्रियमेघ से मिलने उनके आश्रम आए।
जहाँ उनका भव्य स्वागत किया गया। ऋषि कछिवान और ऋषि प्रियमेघ आपस में सशास्त्र करने लगे और ऐसे ही सशास्त्र करते-करते ऋषि कछिवान ने प्रियमेघ से एक पहेली पूछी कि “ऐसी कौन सी चीज है जिसे यदि जला दिया जाए तो उससे तनिक भी रोशनी न हो?”
ऋषि प्रियमेघ काफी सोच-विचार करने के बाद भी उस पहेली का उत्तर देने में असमर्थ रहे। वो जिस चीज़ के बारे में भी सोचते तो उन्हें लगता कि थोड़ी ही सही परन्तु इस वस्तु से रोशनी जरूर निकलेगी।
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उत्तर खोजने की इस अंधाधुंध कोशिश में उनकी उम्र बीत गयी। जब ऋषि प्रियमेघ अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे तब उन्होंने ऋषि कछिवान को संदेश भेजा कि मैं आपके प्रश्न का उत्तर ढूंढने में नाकाम रहा हूँ। परन्तु मुझे विश्वास है कि मेरे वंश में एक ऐसा विद्वान जरूर जन्म लेगा जो आपके इस प्रश्न का उत्तर जरूर देगा।
प्रियमेघ की मृत्यु के बाद इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के जिम्मा उनके पुत्र ने उठाया परन्तु वो भी इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने में नाकाम रहा और उसकी भी मृत्यु हो गयी। ऐसा करते-करते प्रियमेघ कि एक-एक करके आठ पीढ़ियाँ आई पर उस प्रश्न का उत्तर ढूंढने में नाकाम रही।
आठ पीढ़ियाँ स्वर्ग पहुँच चुकी थी – Sabse kathin Sawal
ऋषि कछिवान अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए जीवित रहे। वहीं प्रियमेघ की एक-एक करके आठ पीढ़ियाँ स्वर्ग पहुँच चुकी थी। ऋषि कछिवान अपने पास नेवले की खाल से बनी एक पोटली रखते थे।
जिसमें चावल के कुछ दाने थे और वो प्रतिवर्ष उसमें से एक दाना निकल कर फेंक देते थे। जब तक उस पोटली में चावल का एक-एक दाना था तब तक ऋषि कछिवान को जीवन प्राप्त था।
साकमसौ
ऋषि प्रियमेघ की नौंवी पीढ़ी में एक विद्वान बालक का जन्म हुआ जिसका नाम साकमसौ था। साकमसौ बचपन से ही बुद्धिमान था और प्रत्येक सशास्त्र में विजयी होता था।
परन्तु साकमसौ को एक ही चिंता सताए रहती थी कि पीढ़ियों से चली आ रही उस एक प्रश्न के उत्तर खोजने की चिंता। इसी चिंता में एक दिन साकमसौ को सामवेद का एक श्लोक याद आया। जब उसने इस श्लोक को एक निर्धारित स्वर में गाना शुरू किया तो उसे इस प्रश्न का उत्तर मिल गया।
साकमसौ का उत्तर
जब साकमसौ इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए ऋषि कछिवान के पास गया तो ऋषि समझ गए कि आज उन्हें उनके इस प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा इसलिए उन्होंने अपने एक शिष्य को बुलाकर अपनी चावल वाली पोटली को फेकने का आदेश दिया।
प्रश्न का उत्तर देते हुए साकमसौ कहता है कि जो व्यक्ति ऋग्वेद के ऋचा गाता है सामवेद के साम नही उसका गायन अग्नि के समान होता है जिसमें कोई प्रकाश नही होता है। लेकिन जो व्यक्ति ऋग्वेद के ऋचा के साथ सामवेद का साम भी गाता है उसका गायन उस अग्नि जैसा होता है जिससे रोशनी भी पैदा होती है।
साकमसौ के उत्तर को सुनकर ऋषि कछिवान खुश हुए और उसे आशीर्वाद दिया। इस तरह प्रियमेघ की आठ पीढ़ियों के बाद इस प्रश्न का उत्तर देकर साकमसौ ने अपने पूर्वजों का कलंक भी साफ कर दिया।



