रहस्यमयी गुफा जिसमें छिपा है दुनिया के अंत का विचित्र रहस्य

यह तो इस ब्रह्मांण का नियम है कि जो भी जन्म लेता है उसका मरण भी निश्चित ही होता है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमदभगवत गीता में स्वंय ही इस रहस्य को अर्जुन को बताते हैं और कहते हैं कि यह अखिल ब्रह्मांण जो दिखाई दे रहा है वह एक दिन नहीं रहेगा क्योंरि इस संसार में हर किसी की मृत्यु होनी निश्चित है।

इस कारण समय-समय पर दुनिया खत्म होने की भविष्यवाणियां भी आती रहती हैं मगर अभी दुनिया खत्म होने में काफी वक्त है। भारत की कुछ गुफाएं और मंदिर ऐसे हैं जहां कलयुग के अंत का रहस्य छुपा हुआ है। उन्हीं में से एक है पाताल भुवनेश्वर गुफा।

पाताल भुवनेश्वर गुफा का राज 

स्कंद पुराण में उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में गंगोलीहाट कस्बे में स्थित इस पाताल भुवनेश्वर गुफा के विषय में कहा गया है कि इसमें भगवान शिव का निवास है। सभी देवी-देवता इस गुफा में आकर भगवान शिव की पूजा करते हैं।

यह गुफा पहाड़ी के करीब 90 फीट अंदर है। यह उत्तराखंड के कुमाऊं में अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किमी. की दूरी तय करके पहाड़ी के बीच बसे गंगोलीहाट कस्बे में है। पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

कैसे दिखती है गुफा 

गुफा के संकरे रास्ते से जमीन के अंदर आठ से दस फीट अंदर जाने पर गुफा की दीवारों पर शेषनाग सहित विभिन्न देवी-देवताओं की आकृति नज़र आती है। गुफा की शुरुआत में शेषनाग के फनों की तरह उभरी संरचना पत्थरों पर नज़र आती है। मान्यता है कि धरती इसी पर टिकी है।

गुफा में 4 खंभा 

इस गुफा में चार खंभा है जो चार युगों अर्थात सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग को दर्शाते हैं। इनमें पहले तीन आकारों में कोई परिवर्तन नही होता। जबकि कलियुग का खंभा लम्बाई में अधिक है और इसके ऊपर छत से एक पिंड नीचे लटक रहा है।

क्या कहते हैं पुजारी 

यहां के पुजारी का कहना है कि 7 करोड़ वर्षों में यह पिंड 1 ईंच बढ़ता है। मान्यता है कि जिस दिन यह पिंड कलियुग के खंभे से मिल जाएगा उस दिन कलियुग समाप्त होगा और महाप्रलय आ जाएगा।

पौराणिक महत्व

इस गुफा को त्रेता युग में राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले देखा। द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु शकराचार्य का 822 ई के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया।

इसके बाद चन्द राजाओं ने इस गुफा के विषय मे जाना और आज यहाँ देश विदेश से सैलानी आते हैं एवं गुफा के स्थपत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाते हैं।

हवन कुंड

आगे बढने पर एक छोटा सा हवन कुंड दिखाई देता है। कहा जाता है कि राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जन्मेजय ने इसी कुण्ड में सभी नागों को जला डाला परंतु तक्षक नाम का एक नाग बच निकला जिसने बदला लेते हुए परीक्षित को मौत के घाट उतार दिया। हवन कुण्ड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी है।

महसूस होता है कि हम किसी की हडिडयों पर चल रहे

थोड़ा सा आगे चलते ही महसूस होता है कि जैसे हम किसी की हडिडयों पर चल रहे हों। वहीं सामने की दीवार पर काल भैरव की जीभ की आकृति दिखाई देती है।

थोड़ा और आगे मुड़ी गरदन वाला गरुड़ एक कुण्ड के ऊपर बैठा दिखई देता है। माना जाता है कि भगवान शिव ने इस कुण्ड को अपने नागों के पानी पीने के लिये बनाया था। इसकी देखरेख एक गरुड़ के हाथ में थी। मगर जब गरुड़ ने ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो शिवजी ने गुस्से में उसकी गरदन मोड़ दी।

जलकुण्ड

इसके थोड़ा आगे ऊंची दीवार पर जटानुमा सफेद संरचना है। इस जगह पर एक जलकुण्ड है, जिसके पीछे मान्यता है कि पाण्डवों के प्रवास के दौरान विश्वकर्मा ने उनके लिये यह कुण्ड बनवाया था। यहाँ पांडवों ने तपस्या की थी। मगर आगे दो खुले दरवाजों के अन्दर संकरा रास्ता जाता है। इसके लिए कहा जाता है कि ये द्वार धर्म द्वार और मोक्ष द्वार है।

यहां पर आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित का तांबे का शिवलिंग भी आता है, माना जाता है कि गुफा के आंखिरी छोर पर पाण्डवों ने शिवजी के साथ चौपड़ खेला था। लौटते हुए एक स्थान पर चारों युगों के प्रतीक चार पत्थर हैं। इनमें से एक धीरे धीरे ऊपर उठ रहा है। माना जाता है कि यह कलयुग है और जब यह दीवार से टकरा जायेगा तो प्रलय हो जायेगा।

साभार – विभिन्न स्रोत

Pallavi Sharma

पल्लवी शर्मा एक छोटी लेखक हैं जो सनातन संस्कृति, धर्म, भारत और भी हिन्दी के अनेक विषयों पर लिखतीं हैं। इन्हें सनातन संस्कृति से बहुत लगाव है।

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