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जानिये किस देवता ने दिए थे ब्रह्मा , विष्णु और शिव को वरदान !

दोस्तों हम सब ये तो जानते ही हैं कि हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मा , विष्णु और महेश – इन तीन देवताओं जिन्हें त्रिदेव भी कहा जाता है को सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त है और सभी देवगण इनकी ही स्तुति करते हैं | इसके अलालवा दोस्तों , देवता हों या असुर , सभी घोर तपस्या और  यज्ञ आदि से इनकी स्तुति करते हैं और इनसे वरदान पाने की अभिलाषा करते हैं |

इन त्रिदेवों से बढ़कर कोई इस सृष्टि में नहीं है जो इस पूरे जगत और न जाने कितने ही ब्रह्मांडों का निर्माण,पालन और संहार करते ही रहते हैं | ब्रह्मा को निर्माता, विष्णु को पालनकर्ता और रूद्र (शिव) को संहारकर्ता कहा जाता है | कलियुग में भी इन त्रिदेवों की स्तुति करना एक पुण्य फल की प्राप्ति के लिए सबसे सरल और सही मार्ग बताया जाता है | इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि परमात्मा एक ही हैं और ये इनके रूप हैं जो अपने पद पर स्थित होकर अपना अपना कार्य करते रहते हैं और हर सृष्टि का संचालन, नियंत्रण करने का सामर्थ्य प्राप्त करते हैं |

दोस्तों हमारे वेदों और शास्त्रों में इस बात पर कभी भी कोई संदेह की चर्चा नहीं हुई है कि ब्रह्मा , विष्णु और शिव अलग अलग हैं क्योंकि दोस्तों ये सभी किसी न किसी गुण के आधार हैं जिनसे ये तीन गुण – सत्व, रज और तम इस सृष्टि को प्रभावित करते हैं | तो इसलिए हमें मन से ये बात निकाल देनी चाहिए कि उनकी कोई तुलन हो भी हो सकती है ! जहां तक सृष्टि के प्रारम्भ की बात है तो सर्वप्रथम जल की ही उत्पत्ति थी जिसमें किसी अंड के आकर में सबसे पहले विष्णु का प्रादुर्भाव हुआ और उसके बाद ब्रह्मा और रूद्र की उत्पत्ति हुई थी |

दोस्तों ! सनातन धर्म के अनुसार प्राप्त ज्ञान से हम इन्हीं  देवताओं को सर्वप्रथम पूजनीय मानते हैं और इनसे ऊपर शायद ही किसी देवता की कल्पना कर सकते हैं ! पर दोस्तों !! यहाँ हमें इस ज्ञान और प्रबल करते हुए ये जान लेना चहिये कि पुराणों में ऐसे कई प्रसंग हैं जिनमें इन त्रिदेवों से भी ऊपर किसी देवता का उल्लेख हुआ है और आपको ये जानकार जरूर हैरानी होगी कि इन त्रिदेवों को जो भी शक्ति प्राप्त हुई है वो वरदान स्वरुप उसी देवता से मिली है |

तो दोस्तों वो देव कोई और नहीं स्वयं जगदीश्वर का अन्य रूप श्री सूर्यनारायण महाराज ही हैं जो इस सृष्टि के आदि से ही हमारे समक्ष विराजमान हैं |

दोस्तों भविष्यपुराण के अनुसार कल्प के प्रारम्भ में सभी देवगण और त्रिदेव अहंकार के वशीभूत हो गए थे और तम रुपी मोह ने उन्हें ग्रस्त कर दिया था | उसी समय दोस्तों आकाश से एकाएक एक असहनीय तेज प्रकट हुआ जिसका कोई स्वरुप और आकार नहीं था | सभी देवगणों ने सोचा कि ये कोई दिव्य शक्ति है जो इस अहंकार रुपी अन्धकार को नष्ट करने आई है और उन्होंने उस तेज से थोड़ा शांत होने का आग्रह किया |उसके बाद भगवान् सूर्य अपने विराट स्वरुप में आ गए और सभी देवगणों ने अपनी अपनी स्तुति कर उनका वंदन और अर्चन आदि किया |

इसके बाद दोस्तों भगवान् सूर्य ने ब्रह्मादि देवताओं को अपने स्वरुप और चिंतन , भक्ति के बारे में बताया और उनसे आग्रह किया वे उनके इस सच्चिदानंद स्वरूप का चिंतन करें और मेरा ध्यान करके फलस्वरूप वर मांगें |

इसके बाद दोस्तों भगवान् सूर्य ने अपनी शक्तियां सभी देवताओं को प्रदान कीं और ध्यान लगाने को कहा | थोड़े समय के बाद भगवान् सूर्य सबसे पहले ब्रह्मा के पास आये और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा | इस पर ब्रह्मा ने कहा कि आप मुझे समस्त सृष्टियों का निर्माता बनायें और उचित स्थान दें | इस पर भगवान् सूर्य ने ब्रह्मा को तथाकथित वर और स्थान प्राप्ति का अनुमोदन देते हुए वर दिया |

इसके बाद दोस्तों भगवान् शिव की भक्ति भाव से परिपूर्ण तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् सूर्य ने उनसे भी वर मांगने को कहा | इस पर शिवजी ने उनसे सृष्टियों का संहारकर्ता होने का वर माँगा और उत्तम स्थान की कामना की | इस पर भगवान् सूर्य ने उन्हें तथास्तु कहकर वर दिया और अंतर्धान हो गए |

इसके पश्चात् दोस्तों भगवान सूर्य शालग्राम में स्थित भगवान् विष्णु के पास गए और उनके ताप से प्रभावित होकर उन्हें भी वर मांगने का अनुग्रह किया | इस पर बह्ग्वान विष्णु कहा कि वे उन्हें अपनी अचल भक्ति प्रदान करें और शत्रुओं का नाश करने किस हकती दें जिससे वे समस्त सृष्टियों का पालन कर सकें | भगवन सूर्य ने उन्हें भी वर देकर अपना कार्य सम्पूर्ण किया और अंतर्धान हो गए |

 

 

 

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Shubham Sharma

शुभम शर्मा विज्ञानम् के लेखक हैं जिन्हें विज्ञान, गैजेट्स , रहस्य और पौराणिक विषयों में रूचि है। इसके अलाबा इन्हें खेल और वीडियो बनाना बहुत पसंद है।

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