17 बार ध्वस्त किया गया है ये पवित्र शिव मंदिर, कृष्ण ने यहां त्यागा था अपना शरीर

हम पहले भी आपको कई मंदिरों के बारे में बता चुके हैं और उनके साथ जुड़े रहस्यों और कहानियों को भी हमने बताया है, आज हम एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर की बात करने जा रहे हैं जो भगवान शिव का मंदिर है। इसकी गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। हम बात कर रहे हैं गुजरात के सोमनाथ मंदिर के बारे में जिसे महमूद गजनवी से लेकर कई विदेशी शासकों ने कई बार तोड़ने का प्रयास किया पर हमेशा असफल रहे। 

सोमनाथ मंदिर शाश्वत तीर्थस्थान के नाम से जाना जाता है| पिछली बार नवंबर 1947 में इसकी मरम्मत करवाई गयी थी, उस समय वल्लभभाई पटेल जूनागढ़ दौरे पर आये थे तभी इसकी मरम्मत का निर्णय लिया गया था| पटेल की मृत्यु के बाद कनैयालाल मानकलाल मुंशी के हाथो इसकी मरम्मत का कार्य पूरा किया गया था, जो उस समय भारत सरकार के ही मंत्री थे| यह मंदिर रोज़ सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है| यहाँ रोज़ तीन आरतियाँ होती है, सुबह 7 बजे, दोपहर 12 बजे और श्याम 7 बजे| कहा जाता है की इसी मंदिर के पास भालका नाम की जगह है जहा भगवान क्रिष्ण ने धरती पर अपनी लीला समाप्त की थी|

ज्योतिर्लिंग / Jyotirlinga –

सोमनाथ में पाये जाने वाले शिवलिंग को भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है, यह शिवजी का मुख्य स्थान भी है| इस शिवलिंग के यहाँ स्थापित होने की बहोत सी पौराणिक कथाएँ है| इस पवित्र ज्योतिर्लिंग की स्थापना वही की गयी है जहाँ भगवान शिव ने अपने दर्शन दिए थे| वास्तव में 64 ज्योतिर्लिंग को माना जाता है लेकिन इनमे से 12 ज्योतिर्लिंग को ही सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है|

शिवजी के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ में है और बाकि वाराणसी, रामेश्वरम, द्वारका इत्यादि जगहों पर है|

इतिहास 

प्राचीन समय से ही सोमनाथ पवित्र तीर्थस्थान रहा है, त्रिवेणी संगम के समय से ही इसकी महानता को लोग मानते आये है|
कहा जाता है की चंद्र भगवान सोम ने यहाँ अभिशाप की वजह से अपनी रौनक खो दी थी और यही सरस्वती नदी में उन्होंने स्नान किया था| परिणामस्वरूप चन्द्रमा का वर्धन होता गया और वो घटता गया| इसके शहर प्रभास का अर्थ रौनक से है और साथ ही प्राचीन परम्पराओ के अनुसार इसे सोमेश्वर और सोमनाथ नाम से भी जाना जाता है|

मंदिर का इतिहास 

जे.गॉर्डोन मेल्टन के पारंपरिक दस्तावेजो के अनुसार सोमनाथ में बने पहले शिव मंदिर को बहोत ही पुराने समय में बनाया गया था| और दूसरे मंदिर को वल्लभी के राजा ने 649 CE में बनाया था| कहा जाता है की सिंध के अरब गवर्नर अल-जुनैद ने 725 CE में इसका विनाश किया था| इसके बाद 815 CE में गुर्जर-प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने तीसरे मंदिर का निर्माण करवाया था, इसे लाल पत्थरो से बनवाया गया था|

लेकिन अल-जुनैद द्वारा सोमनाथ पर किये गए आक्रमण का कोई इतिहासिक गवाह नही है| जबकि नागभट्ट द्वितीय जरूर इस तीर्थस्थान के दर्शन करने सौराष्ट्र आये थे| कहा जाता है की सोलंकी राजा मूलराज ने 997 CE में पहले मंदिर का निर्माण करवाया होंगा| जबकि कुछ इतिहासकारो का कहना है की सोलंकी राज मूलराज ने कुछ पुराने मंदिरो का पुनर्निर्माण करवाया था| कहा जाता है की कई बार शासको ने इसे क्षति भी पहोचाई थी लेकिन फिर कुछ राजाओ ने मिलकर इस इतिहासिक पवित्र स्थान की मरम्मत भी करवाई थी|

सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया| मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया| इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्माने इसे राष्ट्र को समर्पित किया| 1948 में प्रभासतीर्थ प्रभास पाटण के नाम से जाना जाता था| इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी| यह जूनागढ रियासत का मुख्य नगर था| लेकिन 1948 के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया|

मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा| मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है| उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है| मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर है| सोमनाथजी के मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है|

सरकार ने ट्रस्ट को जमीन, बाग-बगीचे देकर आय का प्रबंध किया है| यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है| चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है| इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड़ लगती है| इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है| इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है|

मंदिर से जुड़ी  रोचक बाते 

1. 1665 में मुग़ल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का आदेश दे दिया था| लेकिन बाद में इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था| बाद में पुणे के पेशवा, नागपुर के राजा भोसले, कोल्हापुर के छत्रपति भोंसले, रानी अहिल्याबाई होलकर और ग्वालियर के श्रीमंत पाटिलबूआ शिंदे के सामूहिक सहयोग से 1783 में इस मंदिर की मरम्मत की गयी थी|

2. 1296 में अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने मंदिर को क्षतिग्रस्त कर गिरा दिया था| लेकिन अंत में गुजरात के राजा करण ने इसका बचाव किया था|

3. 1024 में मंदिर को अफगान शासक ने क्षति पहोचकर गिरा दिया था| लेकिन फिर परमार राजा भोज और सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम ने 1026 से 1042 के बिच इसका पुनर्निर्माण किया था| कहा जाता है को लकडियो की सहायता से उनकी मंदिर का पुनर्निर्माण किया था लेकिन बाद में कुमारपाल ने इसे बदलकर पत्थरो का बनवाया था|

4. मंदिर की चोटी पर 37 फ़ीट लंबा एक खम्बा है जो दिन में तीन बार बदलता है| वर्तमान सोमनाथ मंदिर का निर्माण 1950 में शुरू हुआ था| मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्रतिष्ठान का कार्य भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने किया था|

5. सोमनाथ मंदिर आज देश में चर्चा का विषय बन चूका है| अब जो हिन्दू धर्म के लोग नही है उन्हें मंदिर में जाने के लिये विशेष परमिशन लेनी होगी| अब तक मिली कंकरी के अनुसार जो हिन्दू नही है उन्हें मंदिर में जाने के लिए ट्रस्ट को मान्य कारण बताना होगा|

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