सबसे रहस्यमयी है यह तीर्थ , पाप हो जाने पर घुटता है दम !

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भारत देश तीर्थों का देश है, यहां हर जगह आपको रहस्यमयी तीर्थ मिल जायेंगे। भारत में तीर्थों का विशेष महत्व होता है, यहां लोग अपनी मन्नते माँगने तो आते ही हैं, अपितु अपने पापों का प्रायश्चित भी करते हैं।

आज  हम आपको बताने जा रहे है, एक ऐसे स्थान के बारे में जहां, अनजाने में हुर्इ हत्या का बोझ इंसान से उतर सकता है। जीवनभर को समार्इ घुटन से मुक्ति मिल सकती है.. .

परशुराम कुंड, असम

जिस किसी व्यक्ति से पाप हो जाता है, वह प्रकृति की गोद में जब यहां पहुंचता है तो अंदर ही अंदर महसूस होती घुटन कम हो जाती है। पौराणिक मान्याताओं के अनुसार यह वही जगह है, जहां भगवान परशुराम ने अपनी मां की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए प्रयत्न किया था।

आखिर क्यों किया भगवान परशुराम ने अपनी माँ का वध –

यौनइच्छा धारण किए हुए महर्षि जमदग्नि की पत्नी रेणुका का आश्रम में आ जाना जमदग्नि के लिए किसी शर्मिंदगी से कम नहीं था। इसलिए उन्होंने रेणुका को उसी वक्त मार डलवाने का निश्चय किया। जब परशुराम के अन्य भार्इ इस नरहत्या के लिए तैयार नहीं हुए तो, खुद परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करने का निश्चिय किया। उन्होंने तत्काल अपनी मां की हत्या कर दी। इस कृत्य के बाद परशुराम को बडी ग्लानि हुर्इ, इधर यह देखकर महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और परशुराम को वर मांगने के लिए कहा। तो उन्होंने तीन वरदान माँगे-

माँ पुनर्जीवित हो जायँ,
उन्हें मरने की स्मृति न रहे,
भाई चेतना-युक्त हो जायँ और

जमदग्नि ने उन्हें तीनो वरदान दे दिये। माता तो पुनः जीवित हो गई पर परशुराम पर मातृहत्या का पाप चढ़ गया। परशुराम पर हत्या का कलंक था, इसके लिए जमदग्नि ने परशुराम से कहा कि वह ब्रह्मकुंड में जाकर स्नान करे। तो दोषमुक्ति मिल सकती है।

परशुराम के ब्रह्मकुंड में डुबकी लगाते ही, उनसे हत्या का पाप उतर गया। कहा जाता है कि युगांतर के बाद यही ब्रह्मकुंड ब्रह्मपुत्र नदी बन गया। जहां नदी ने सबसे पहले धरती को स्पर्श किया, वह स्थान परशुरामकुंड कहा जाता है। यह स्थान भारत के पूर्वोत्तर में असम राज्य में पड़ता है। श्रद्घालुओं की एक खास पर्व पर भीड़ होती है, जब वे यहां स्नान करते हैं।

परशुराम कुण्ड (Parshuram Kund) :-

मान्यता है की जिस फरसे से परशुराम जी ने अपनी माता की हत्या की थी वो फरसा उनके हाथ से चिपक गया था। तब उनके पिता ने कहा की तुम इसी अवस्था में अलग-अलग नदियों में जाकर स्नान करो , जहाँ तुम्हें अपनी माता की हत्या के पाप से मुक्ति मिलेगी वही यह फरसा हाथ से अलग हो जाएगा। पिता की आज्ञा अनुसार उस फरसे को लिए-लिए परशुराम जी ने सम्पूर्ण भारत के देवस्थानों का भ्रमण किया पर कही भी उस फरसे से मुक्ति नहीं मिली। पर जब परशुराम जी ने आकर लोहित स्तिथ इस कुण्ड में स्नान किया तो वो फरसा हाथ से अलग होकर इसी कुण्ड में गिर गया। इस प्रकार भगवन परशुराम अपनी माता की हत्या के पाप से मुक्त हुए और इस कुण्ड का नाम परशुराम कुण्ड पड़ा।

परशुराम कुण्ड को प्रभु कुठार के नाम से भी जाना जाता है। यह अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिला की उत्तर-पूर्व दिशा में 24 किमी की दूरी पर स्थित है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि मकर संक्रांति के अवसर परशुराम कुंड में एक डूबकी लगाने से सारे पाप कट जाते है। समय के साथ यह स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों में भी लोकप्रिय हो गया। अब यह कुण्ड लोहित की पहचान बन चुका है।

हजारों तीर्थयात्री प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रान्ति के दिन इस कुण्ड में स्नान करने आते हैं। अरूणाचल प्रदेश ही नहीं वरन् समूचा उत्तरपूर्व, नेपाल और भूटान तक का श्रध्दालु समाज मकर संक्रांति पर्व के समय इस कुण्ड पर सहज खिंचा चला आता है।

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