Poems

“खुदगर्ज इंसान” – कविता

एक इंसान अपने जीवन में कई परिस्थितियों का सामना करके ही आगे बढ़ता है, अपनों को खुश करने की चाहत में उसे कई बार अपनी चाहतों की भी कुर्बानी देनी पड़ती है। एक खुदगर्ज इंसान इस दर्द को अच्छे से समझता है और उसी दर्द को हम आज आपके सामने कुछ शब्दों में रख रहे हैं, तो इसे जरूर पढ़िए  –

लगाया था जो पौधा बचपन में ,
आज उसी को काटने मैं चला हूँ,

बेटे का बचपन उजागर करने में ,
खुद के बचपन को उखाड़ने मैं चला हूँ,

जिसकी बाहों में काटी थी रोज की वो शामें ,
आज उन्ही बाहों को काटने मैं चला हूँ,

डाल के झूला सावन में जिसकी गोद में झूला था ,
आज उसी गोद को उजाड़ने मैं चला हूँ,

मीठे फलों को खाकर जिसके मैंने भरा था अपना पेट,
आज उसी के पेट पर कुल्हाड़ी चलाने मैं चला हूँ,

माँगा नही सिवाए प्यार के उसने कुछ भी मुझसे ,
आज उसी को नफरत से काटने मैं चला हूँ ।।

कवि – अभिनय प्रसाद 

विज्ञानम् कविताओं को साझा करने का भी माध्यम है, कविताएं कवि के वह शब्द होते हैं जो उसके दिल से निकलते हैं, इन शब्दों में वह जादू होता है जो किसी की भी मन की स्थिति को एक क्षण में बदल देता है। यदि आप विज्ञानम् के लिए कविताएं लिखना चाहते हैं तो यहां संपर्क करें…. 

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