“ ग़म – ए – आरज़ू ” – कविता

ग़मों  का वो सागर जो छूटा न हमसे ,

आरज़ू का वो आँचल जो छोड़ा न हमने ,

चले साथ दोनों हमेशा ही यूँ ही ,

ज़िन्दगी से मोहब्बत वो छोड़ा न हमने I

 

कई वक़्त आये सफ़र में सुहाने ,

लगे कुछ वो अपने अफ़साने पुराने ,

नींदों में वो सपने रहे चलते यूँ ही ,

अरमानों की आहट वो छोड़ी न हमने I

 

मिले चाहें कितने भी पल आंसुओं के ,

समझलो ये शुरुआत है खुशबुओं की ,

है उजली सुबह बनाई खुदा ने ,

ना छूटे कभी वो पहल मंजिलों की I

 

रखो राहें हरदम आसमानों के जैसी ,

समेटे जो सबको अपना समझके ,

बढ़ो एकता से इंसानियत के खातिर ,

पसंद है जो रब को , एक अमानत के जैसी I

 

प्यार भर दो ज़माने में तुम इस कदर की ,

मिट जायें ग़मों के ये गहरे से धब्बे ,

आरज़ू की हो दस्तक हमेशा ही मन में ,

मगर आरज़ू हो बिना इन ग़मों के I

 

 

 

 

 

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