Poems

“हक़ हमें भी था कभी” – कविता

हक़ हमे था कभी जैसे हर बंदगी का,

सभी वादियों का और इस ज़िन्दगी का,

 

ना रोके रुके थे कभी हम किसी से,

आज़माइश  भी न की कभी भी किसी ने,

मगर मोड़ देखो, एक ऐसा भी आया,

कि दिखने लगा है असर दिल्लगी का,

हक़ हमे था कभी…

 

ये उन्नत नज़ारे हमारे लिए भी,

खिले वो सितारे हुमारे लिए भी,

न था कोई सपना जो मुमकिन नहीं था,

ठुकराया गया है सफर सादगी का,

हक़ हमे था कभी …

 

ये दुनिया का नक्शा हमे क्या पता था,

पता था अगर तो ख़ुशी का पता था,

भटकना तो था ही मगर क्या खबर थी ,

कि छूटेगा  यूँ  ही भॅवर हर घड़ी का,

हक़ हमे था कभी …

हक़ हमे था कभी …

Balram Kumar Ray

बलराम कुमार राय विज्ञानम् के गैजेट्स केटेगरी के लेखक हैं. इन्हें टेक्नोलॉजी , गैजेट्स, और Apps पर लिखने में बहुत रूचि है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Close