Poems

शहीद दिवस – कविता

24 मार्च 1931 को जब भगत सिंह , राजगुरु और सुख देव को फाँसी होनी थी लेकिन अंग्रेजी सरकार ने  23 मार्च रात  7:30 बजे धोखे से इन लोगों को फाँसी पर लटका दिया था । इसी दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाते हुए मैं कुछ पंक्तियाँ पेश कर रहा हूँ ।

पैदा हुआ तो दिल मे देशप्रेम था,
चलना सीखा तो सीने में जुनून था ।
जाते थे और बच्चे किताबे लेकर
हमारे हाथों में तमंचा था ।

बैठे थे लोग घरों में परिवार के साथ ,

हम थे बन्दूकों और हथियारों के साथ ।

फोड़ा था बम जब असेंबली में ,

मची थी खलबली तब फिरंगियों के दिलों में ।

डाल दिया था जब हमको जेल में,

आये थे और फिरंगी तब रेल में ।

जब चला मुकद्दमा हुई सुनवाई,

तब फिरंगियों ने 24 मार्च को फांसी  की सजा सुनाई।

दहल गए क्रांतिकारियों के दिल

भूल गए past और present,
जब गांधीजी ने ठुकरा दिया था हमे बचाने का agreement



था दिन वो इतिहास का काला ,

जब सजा के 1 दिन पहले लगा हमारी जिंदगी पर ताला ।

हुई आंखे बंद रह गया सपना आज़ाद भारत का अधूरा ,

हम तो चले गए न जाने कौन करेगा इसको पूरा ।

कवि – अभिनय प्रसाद 

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