Poems

” रंग चाहतों के ” – कविता

इंसान चाहतों को लेकर ही अपने जीवन को जीता है, उसके दिल में हर समय एक ना एक चाहत होती ही है जिसे वह जीना चाहता है। कभी सपने को पूरा करने की चाहत तो कभी अपनों को खुश करने की चाहत। यह चाहत के ही तो रंग हैं जो इंसान के जीवन में ऐसा रंग भरते हैं कि उसे सिर्फ शब्दों में ही बंया किया जा सकता है –

 

हालातों से शिकवे और गिले कुछ अपनों से,

मगर बनते है सपने कुछ ऐसे ही पन्नो से,

है मुश्किल समझना जरुरत के खातिर,

सच्चाई है कि, ये हैं “रंग चाहतों के” !

 

दिल ने चाहा हमेशा कि मिल जाएं सपने,

किनारो पर अक्सर वो रस्ते थे अपने,

था मुश्किल सा चलना उन रास्तों पर,

पर थे वो भी अपने ही “रंग चाहतों के”!

 

मिजाज़ इस कदर था उन चाहतों का,

गुरुरों भरा था चमन आदतों का,

वक़्त ने ही सिखाया के न होगा हासिल,

न आता समय जब तलक राहतो का,

 

सीखकर यूँ संभालना, है असर चाहतों का,

मगर गिरके रुकना, सबर चाहतों का,

बहुत कुछ नहीं है इन्हे पाल लेना,

मगर पालना भी है “रंग चाहतों का”!

 

दिखेगा असर जब उन इबादतों का,

उन चाहतों का और उन मुद्दत्तों का,

फिर लगने लगेगा ज़रूरत ही न थी,

जो करते थे हरदम हम, उन चाहतों का

फिर बदलेगा तब से चलन आदतों का

और है यही असली “रंग चाहतों का”!

 

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Balram Kumar Ray

बलराम कुमार राय विज्ञानम् के गैजेट्स केटेगरी के लेखक हैं. इन्हें टेक्नोलॉजी , गैजेट्स, और Apps पर लिखने में बहुत रूचि है।

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