“ यादों की अटकलें ” – कविता

बढ़ते रहने का शायद सफ़र यूँ  न होता ,

अगर छूट जाती वो यादों की सांसें ,

हर कदम पर सिखाई है जिसने हकीकत ,

रहे यूँ ही चलती यादों की वो रातें I

 

खताएं बहुत की , बिना सोचे समझे ,

सज़ाएं भी झेली बिना आंसुओं के ,

बनी वो भी निश्चित ही यादें हमारी ,

था जिसका असर बिना उल्फतों के I

 

 

आसमां से जो बरसी , वो बूँदें यादों की ,

     दे गयी वो बहुत कुछ , भिगाते  हुए भी ,

   खताओं पर ना होती अपनी विजय फिर ,

        अगर यादें ना होती सताते हुए भी I

 

 

वक़्त का ये ठहरना यादों के महल में ,

लबों का फिसलना , ऐसे ही पहल में ,

लगाने लगे हम अटकलों के ही गोते ,

यादों के सबब में और उसके ही कल में I

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