Poems

“ बदलती इंसानियत ” – कविता

सनसनाता ये शहर , भागती ये दुनिया ,

परिंदों का अकेलापन , अपनों से दूरियाँ ,

बढती ज़रूरतें , इंसानियत की कीमतें ,

बनती ही जा रही बस मज़हबी इमारतें I

 

आग भरा गुस्सा जलाता ही जा रहा ,

संवेदना तो बस एक शब्द ही रह गया ,

आज आज़माता हर घड़ी इंसान को इंसान ही ,

और वो आजमाना भी आज सिर्फ स्वार्थ ही रह गया I

 

छोड़ खुद पर भरोसा लोग नकारात्मक हो रहे ,

और है जिनको उम्मीदें वो आंदोलन कर रहे,

आतंक का भी एक ज़हर युवाओं में घोला जा रहा ,

और करने वाले इस पर भी राजनीति कर रहे I

 

पैसों की है दौड़ बस हर तरफ हर गली  ,

इंसानियत भी आज खून के राह चल पड़ी ,

नही था ऐसा इंसान , जब उस खुदा ने गढ़ा ,

इंसान ही जिम्मेदार है जो इन राहों पर बढ़ा I

Balram Kumar Ray

बलराम कुमार राय विज्ञानम् के गैजेट्स केटेगरी के लेखक हैं. इन्हें टेक्नोलॉजी , गैजेट्स, और Apps पर लिखने में बहुत रूचि है।

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