” बचपन ” – कविता

खेलने का वो मकसद , खिलखिलाने की आशा

रौनकों का समंदर , वो चेहरे की  भाषा

समझ तो नहीं थी समझने की कुछ भी ,

था जैसा भी बचपन , खूबसूरत बहुत था I

 

वो रोना हमारा चंद लम्हों के खातिर ,

फिर पल में सिमटना उन अगले पलों में ,

अनचाही सी खुशियों में बस जाते थे  यूँ ही ,

फिर उनसे निकलना नही था दिलों में ,

कहीं ना कहीं एक एहसास सा था ,

था जैसा भी बचपन खूबसूरत बहुत था I

 

ना थी फिक्र कोई , उजालों सी रातें ,

बूंदों से वो मिलना , कश्तियों से वो बातें ,

उम्र का वो ज़माना भी क्या कुछ ग़ज़ब था ,

था जैसा भी बचपन खुबसूरत बहुत था I

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