“ निस्वार्थता ” – कविता

 

ये जीवन हमेशा हो वृक्षों के जैसा ,

जो देते हैं मानव को कितने सहारे

 

फल , फूल , लकड़ी , सारी सम्पदायें,

पक्षियों का बसेरा और कितनी बहारें

 

समुद्रों का होना भी निस्वार्थ ही है ,

जो देतीं हैं कितने ही जीवों को जीवन

 

पर नही चाहिए उनको  कुछ भी किसी से,

काश बन पता मानव का ऐसा ही कुछ मन

 

अगर रखनी है हसरत कभी यूँ मदद की,

तो करना हमेशा निस्वार्थता से ,

 

मिलती जब हैं खुशियाँ तुम्हारे ही कारण ,

तो दुआएं हैं मिलती फिर  शुद्धता से

 

हैं झरने भी गिरते , फिज़ाओं की खातिर

गिरकर भी देते हैं दूसरों को खुशियाँ

 

प्रभु – प्रार्थना भी हो निस्वार्थता से ,

मिलेगी सभी को उनकी चाहत की दुनिया I

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