Poems

“कश्मकश” – कविता

मानव जीवन में कश्मकश हमेशा बनी रहती है। कई वह सवालों की कश्मकश में जीता है तो कभी भाग – दौड़ और दुनिया की कश्मकश रहती है। यदि मानव को कई समझने वाला मिल जाये तो उसकी कश्मकश कम हो सकती है। मानव का क्या है अकेला आता है और अकेला चला जाता है, एक कश्मकश भरी जिंदगी में उसके कोई साथी समझने वाला मिल जाये तो जिंदगी में चाहतों के रंग भर जाते हैं।

सिर्फ यही कश्मकश हमेशा रहेगी ,

कि कब तक सवालो में जीते रहेंगे,


न कोई समझ, न समझाने वाला,

हम कब तक इस सच को समझते रहेंगे!


ना लहरे, ना सागर, ना बगिया, ना फूल,

कोशिशे रही चलती, पर न हो सके कबूल!


लगा मिलके तुमसे, तुम समझने लगे थे,

मगर क्या खबर थी , कि समझने की आस में,

हकीकत तो यह थी, हम उलझने लगे थे!


थी मुकद्दर से आरज़ू हमेशा इन अरमानो की,

मगर हम जहाँ थे, वो दुनिया थी अफ़सानो की,


रहे इस कदर हम उम्मीदों में जिनकी ,

ना सोचा कभी सिलसिले यह भी होंगे,

मुस्कुराने से आंसू नहीं है ठहरते ,

इस तरह की शिकायत कभी हम भी करेंगे,

सिर्फ यही कश्मकश हमेशा रहेगी…

रचयिता – बलराम कुमार राय

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Balram Kumar Ray

बलराम कुमार राय विज्ञानम् के गैजेट्स केटेगरी के लेखक हैं. इन्हें टेक्नोलॉजी , गैजेट्स, और Apps पर लिखने में बहुत रूचि है।

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